ट्रुथ-डेयर से बाथरूम में फाड़ी माँ की चूत!

Family Sex Story : ट्रुथ-डेयर के बाद बाथरूम में चोदी माँ की टाइट चूत! मूसल लंड से फाड़ी चुत! छोड़ी बहन के जागने का डर! और बाथरूम की चुदाई से चुत में झड़ने का सफर!

अभी तक “गेम खेलकर माँ के सामने तोड़ी बहन की सील!” में आपने पढ़ा :- 

अनन्या रोहन के साथ झड़ चुकी थी। माँ मीरा ने सिर्फ देखा और अनन्या के बाल सहलाए। अनन्या ने कहा कि अभी मत निकाल। माँ चुप रहीं।

अब आगे, उसी कहानी का :-

अनन्या कुछ देर तक मेरी बाँहों में लेटी रही। उसकी साँसें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं। वो मेरे सीने पर सिर रखकर बोली, “रोहन… मुझे नींद आ रही है। आज बहुत थक गई हूँ।”

मैंने उसके बाल सहलाए। “सो जा। मैं यहीं हूँ।” अनन्या ने आँखें बंद कर लीं। पाँच-सात मिनट में उसकी साँसें गहरी हो गईं। वो सो गई थी।

माँ अभी भी सोफे के किनारे बैठी थीं। उनके स्तन नंगे थे। चूत पर हाथ रखा हुआ था। उन्होंने अनन्या की तरफ देखा और फिर मेरी तरफ।

“रोहन… वो सो गई। अब तू उठ जा। मैं चादर लेकर आती हूँ।” उनकी आवाज धीमी थी। थोड़ी काँप रही थी।

मैंने लंड अनन्या की चूत से धीरे से निकाला। अनन्या ने हल्की सी सिसकी भरी लेकिन जागी नहीं। मैं उठा और माँ के पास गया। माँ ने आँखें झुका लीं।

“रोहन… आज रात जो हुआ… वो अनन्या के साथ था। मुझे मत देख ऐसे।” मैंने कुछ नहीं कहा। बस उनके सामने खड़ा रहा। मेरा लंड अभी भी गीला और आधा खड़ा था।

माँ ने गहरी साँस ली। “मैं बाथरूम जा रही हूँ। तू अनन्या को ढक दे।” वो उठीं। उनकी गांड हिली। मैंने देखा। माँ रुक गईं।

बिना घूमे बोलीं, “रोहन… अगर तू मेरे पीछे आएगा तो मैं दरवाजा बंद नहीं करूँगी। लेकिन मैं कुछ नहीं बोलूँगी। तू जो करना चाहे… धीरे करना।”

मैं उनके पीछे बाथरूम गया। दरवाजा खुला था। माँ शीशे के सामने खड़ी थीं। उन्होंने पानी से मुँह धोया। जब वो मुड़ीं तो मैं दरवाजे पर खड़ा था। माँ ने कुछ नहीं कहा। बस मेरी तरफ देखा।

उनके स्तन भारी थे। निप्पल अभी भी तने हुए थे। चूत पर बाल गीले थे।

मैंने अंदर कदम रखा और दरवाजा हल्का सा बंद किया। माँ पीछे हटीं। उनकी पीठ दीवार से लगी। “रोहन… मैं तेरी माँ हूँ। ये गलत है।” उनकी आवाज धीमी थी। मैंने उनके करीब जाकर हाथ उनकी कमर पर रखा।

“माँ… तुमने खुद कहा था कि दरवाजा बंद नहीं करोगी।” माँ ने आँखें बंद कर लीं। “मैं डर रही थी। लेकिन अब… अब मत रुक।”

मैंने उनके होंठों पर मुँह रखा। माँ ने पहले विरोध किया। फिर धीरे-धीरे जवाब दिया। उनका किस गहरा नहीं था। हल्का और काँपता हुआ। मैंने एक हाथ उनके स्तन पर रखा और धीरे से मसला। माँ ने आह भरी।

“आह्ह… रोहन… धीरे…” मैंने निप्पल को उँगलियों से दबाया। माँ की कमर काँप उठी।

मैं घुटनों के बल बैठा। माँ की टाँगें थोड़ी फैलीं। मैंने उनकी चूत पर जीभ फेरी। माँ ने सिर पीछे किया।

“आह्ह… रोहन… वहाँ मत… आह्ह…” लेकिन उन्होंने मुझे रोका नहीं। मैंने दोनों हाथों से उनकी जाँघें फैलाईं और चूत चाटने लगा। माँ की उँगलियाँ मेरे बालों में घुस गईं। “आह्ह… धीरे… आह्ह… रोहन…”

माँ की चूत गीली हो रही थी। मैंने दो उँगलियाँ अंदर डालीं। माँ ने दाँत भींच लिए।

“आह्ह्ह… बहुत दिन हो गए… आह्ह…” मैंने उँगलियाँ धीरे-धीरे हिलाईं। माँ की साँसें तेज हो गईं। वो दीवार से सटकर खड़ी थीं। उनके स्तन हर साँस के साथ हिल रहे थे।

मैं उठा। लंड उनकी चूत पर रखा। माँ ने मेरी तरफ देखा। उनकी आँखों में डर और कुछ और दोनों थे।

“रोहन… अगर तू डालेगा… तो धीरे। और अंदर मत छोड़ना। समझा?” मैंने सिर हिलाया। “समझा माँ।”

मैंने धीरे से टोपा अंदर किया। माँ की चूत टाइट थी। उन्होंने मेरी कलाई पकड़ ली।

“रुक… आह्ह… थोड़ा रुक…” मैं रुका। माँ ने गहरी साँस ली। “अब और डाल। लेकिन पूरा एक साथ मत।” मैंने धीरे-धीरे और अंदर किया। माँ की आँखें भींच गईं। उनके मुँह से लंबी कराह निकली। “आह्ह्ह… रोहन… पूरा आ गया…”

मैंने कुछ देर बिना हिले अंदर रखा। माँ की चूत लंड को जकड़ रही थी। उन्होंने मेरी गर्दन में बाँहें डालीं।

“अब हिला। धीरे-धीरे। और मुझे चूम।” मैंने उनके होंठों पर मुँह रखा और धीमे धक्के शुरू किए। माँ हर धक्के पर हल्की सिसकी भर रही थीं। “आह्ह… हाँ… ऐसे ही… आह्ह… रोहन…”

बाथरूम में सिर्फ हमारी साँसें और हल्की “फच” की आवाज थी। माँ की टाँगें काँप रही थीं। उन्होंने एक टाँग मेरी कमर पर चढ़ा दी।

“और गहरा… लेकिन तेज मत… आह्ह…” मैंने उनकी गांड को दोनों हाथों से पकड़ा और थोड़े गहरे धक्के मारे। माँ का शरीर दीवार से टकरा रहा था। उनके स्तन मेरे सीने से दब रहे थे।

माँ ने मेरे कान में फुसफुसाया, “रोहन… मैं झड़ने वाली हूँ… मत रुक… आह्ह…” मैंने स्पीड थोड़ी बढ़ाई।

माँ की उँगलियाँ मेरी पीठ में गड़ गईं। उनका शरीर तन गया। उन्होंने जोर से आह भरी। “आह्ह्ह्ह… रोहन… आ गया… आह्ह… बेटा…” उनकी चूत ने लंड को कस लिया। वो काँपते हुए झड़ गईं।

मैंने अंदर ही रखा। माँ हाँफ रही थीं। उनका सिर मेरे कंधे पर था। “रोहन… निकाल ले। अभी मत छोड़ना अंदर।”

मैंने धीरे से लंड बाहर निकाला। माँ की चूत से थोड़ा पानी बहकर उनकी जाँघ पर चला गया। उन्होंने दीवार का सहारा लिया। साँसें अभी भी तेज थीं।

माँ ने मेरी तरफ देखा। उनकी आँखें गीली थीं। “रोहन… आज की रात यहीं खत्म। अनन्या सो रही है। हम दोनों भी सो जाएंगे। कल… कल देखा जाएगा।” उन्होंने मेरे गाल पर हाथ रखा।

“और ये बात किसी को मत बताना। न अनन्या को। न किसी और को।”

मैंने सिर हिलाया। माँ ने तौलिया उठाया और अपने शरीर को ढका। हम दोनों बाथरूम से बाहर आए। अनन्या अभी भी सोफे पर सो रही थी। माँ ने उसे चादर से ढका। फिर मेरी तरफ देखा।

“चल। अपने कमरे में जा। मैं यहीं अनन्या के पास बैठती हूँ।”

मैं अपने कमरे में चला गया। बिस्तर पर लेटकर आँखें बंद कीं। माँ की चूत की गरमाहट अभी भी लंड पर थी। अनन्या की भी। लेकिन आज की रात दोनों के साथ अलग-अलग हुई थी। और माँ ने साफ कहा था कि कल देखा जाएगा।

सुबह साढ़े सात बजे अनन्या की आँख खुली। सोफे पर चादर ओढ़ी हुई थी। माँ किचन में चाय बना रही थीं। अनन्या उठी और किचन गई। माँ ने उसे देखा और सामान्य आवाज में कहा,

“उठ गई? चाय ले। रोहन अभी सो रहा है।” अनन्या ने चाय का कप हाथ में लिया। कुछ देर चुप रही। फिर बोली, “माँ… कल रात… तुमने सब देखा था।”

माँ ने गैस बंद की। उनकी आवाज शांत थी। “हाँ देखा था। और मैंने रोहन से कहा था कि आज की रात यहीं खत्म। वो अपने कमरे में चला गया। मैं तेरे पास बैठी रही।” अनन्या ने माँ की तरफ देखा।

“माँ… तुम्हें बुरा तो नहीं लगा?” माँ ने सिर हिलाया। “बुरा नहीं लगा। लेकिन ये बात घर से बाहर नहीं जानी चाहिए। और रोहन से भी ज्यादा बात मत करना अभी। वो खुद समझ जाएगा।”

अनन्या कुछ नहीं बोली। चाय पीती रही। थोड़ी देर बाद मैं उठकर किचन में आया। तीनों की नजरें मिलीं। कोई कुछ नहीं बोला। माँ ने मुझे चाय दी।

“बैठ। नाश्ता बना रही हूँ।” अनन्या मेरे बगल में बैठी। उसके घुटने हल्के से मेरे घुटने से छू रहे थे। वो कुछ नहीं बोली। मैंने भी कुछ नहीं कहा।

नाश्ते के दौरान अनन्या बोली, “आज बाहर नहीं जाना। घर पर ही रहेंगे।”

माँ ने कहा, “ठीक है। मैं भी कहीं नहीं जा रही।” मैंने सिर हिलाया। खाना खत्म होने के बाद अनन्या अपने कमरे में चली गई। माँ बर्तन धोने लगीं। मैं किचन में ही खड़ा रहा।

माँ ने बिना घूमे कहा, “रोहन… कल रात जो हुआ वो दोनों के साथ अलग-अलग हुआ। आज दिन में कुछ नहीं करना। शाम को देखा जाएगा। समझा?”

मैंने कहा, “समझा माँ।” माँ ने बर्तन रखे और मेरी तरफ मुड़ीं। “और अनन्या से भी यही कह देना। वो पूछे तो बोलना कि माँ ने मना किया है।”

दोपहर को अनन्या मेरे कमरे में आई। दरवाजा बंद करके बोली, “रोहन… माँ ने क्या कहा?” मैंने उसे सब बता दिया। अनन्या सोफे पर बैठ गई।

“माँ डर रही हैं। लेकिन कल रात उन्होंने खुद मुझे हाथ पकड़कर रखा था जब तू मुझे चोद रहा था।” मैंने उसके पास बैठकर कहा, “अनन्या… आज कुछ मत करना। माँ ने कहा है शाम तक इंतजार कर।”

अनन्या ने सिर हिलाया। “ठीक है। लेकिन शाम को मैं चुप नहीं बैठूँगी।”

शाम को साढ़े छह बजे तीनों फिर लिविंग रूम में थे। टीवी चल रहा था। अनन्या मेरे बगल में बैठी थी। माँ दूसरी तरफ। अनन्या ने धीरे से कहा, “माँ… कल रात के बाद आज कुछ बोलना चाहिए।” माँ ने टीवी की आवाज कम की।

“क्या बोलना है अनन्या?” अनन्या ने सीधे कहा, “माँ… मैं और रोहन कल रात साथ थे। तुमने देखा। और तुम भी बाथरूम में रोहन के साथ थीं। मैंने सुना था। दरवाजा पूरा बंद नहीं था।”

माँ की साँस रुक गई। उन्होंने मेरी तरफ देखा। मैंने आँखें झुका लीं। अनन्या आगे बोली, “माँ… अब छुपाने की जरूरत नहीं। पापा दुबई में हैं। घर में तीन लोग हैं। जो हुआ वो हुआ।

अब या तो हम तीनों मिलकर आगे बढ़ें… या फिर कल से सब सामान्य हो जाए।”

माँ कुछ देर चुप रहीं। फिर धीरे से कहा, “अनन्या… तू सही कह रही है।

मैंने खुद रोहन को रोका नहीं। और तुझे भी नहीं रोका। लेकिन ये आसान नहीं है। अगर हम तीनों एक साथ हुए… तो वापस लौटना मुश्किल होगा।” अनन्या ने माँ का हाथ पकड़ा।

“माँ… मुझे वापस नहीं लौटना। और रोहन को भी नहीं। तुम बताओ… तुम्हें क्या करना है?”

माँ ने मेरी तरफ देखा। “रोहन… तू क्या कहता है?” मैंने कहा, “माँ… मैं दोनों को चाहता हूँ। लेकिन जबरदस्ती नहीं। जो तुम दोनों कहोगी वही होगा।” माँ ने गहरी साँस ली।

“ठीक है। आज रात तीनों साथ सोएंगे। लेकिन धीरे-धीरे। कोई जल्दी नहीं करेगा। और जो भी होगा… वो तीनों की सहमति से होगा।”

अनन्या मुस्कुराई। माँ ने टीवी बंद कर दिया। तीनों कुछ देर चुप बैठे रहे। फिर माँ उठीं। “मैं नहाने जा रही हूँ। तुम दोनों यहीं रहो। मैं आऊँगी तो देखेंगे।” अनन्या ने मेरे कान में कहा,

“रोहन… आज रात माँ भी साथ होंगी। लेकिन पहले तू मुझे संभाल। माँ देखेंगी। फिर वो खुद आएंगी।”

मैंने सिर हिलाया। अनन्या ने अपना हाथ मेरी जांघ पर रखा। “और आज रात कोई डेयर नहीं। सीधे। लेकिन धीरे। माँ ने कहा है।” माँ बाथरूम से आवाज देकर बोलीं,

“अनन्या… मेरे तौलिये में कोई साफ ब्रा डाल देना। मैं भूल गई।” अनन्या उठी और माँ के कमरे में चली गई। मैं सोफे पर बैठा रहा। दिल जोर से धड़क रहा था।

रात अभी शुरू नहीं हुई थी। लेकिन तीनों जानते थे कि आज कुछ और होने वाला है। धीरे-धीरे। और तीनों की मर्जी से।

माँ बाथरूम से निकलीं तो सिर्फ तौलिया लपेटे हुए थीं। बाल गीले थे। अनन्या ने उन्हें साफ ब्रा दे दी थी।

माँ ने तौलिया नहीं खोला। सोफे पर बैठकर बोलीं, “मैं तैयार हूँ। लेकिन आज रात कोई जल्दी नहीं करेगा। जो भी होगा वो तीनों की मर्जी से होगा।”

अनन्या उठी और मेरे हाथ पकड़कर खींचा। “माँ… तुम यहीं बैठो। पहले मैं और रोहन। तुम देखो। जब मन करे तो आ जाना।” माँ ने सिर हिलाया। “ठीक है। मैं देखूँगी।”

अनन्या मुझे अपने कमरे में ले गई। दरवाजा खुला रखा। बिस्तर पर लेट गई और मुझे अपने ऊपर खींचा। “रोहन… आज धीरे करना। माँ बाहर बैठी हैं। वो सुन रही होंगी।” मैंने उसके होंठों पर मुँह रखा।

अनन्या ने गहरा किस किया। उसका हाथ मेरी पैंट के अंदर चला गया। लंड पहले से खड़ा था। अनन्या ने उसे सहलाया और बोली, “ये अभी भी वैसा ही है। कल रात जैसा।”

मैंने उसकी टी-शर्ट ऊपर की। ब्रा नहीं थी। स्तन बाहर आ गए। मैंने एक निप्पल मुँह में लिया। अनन्या कराह उठी। “आह्ह… रोहन… चूस… आह्ह…” उसके हाथ मेरे बालों में थे।

मैंने दूसरे स्तन को भी चूसा। अनन्या की कमर हिल रही थी। “नीचे जा… मेरी चूत चाट…”

मैं नीचे गया। उसकी शॉर्ट्स और पैंटी उतारी। चूत गीली थी। मैंने जीभ फेरी। अनन्या ने टाँगें फैलाईं। “आह्ह… हाँ… ऐसे ही… आह्ह… रोहन…” मैंने दो उँगलियाँ डाल दीं।

अनन्या की साँसें तेज हो गईं। “अब डाल… लेकिन धीरे…”

मैंने लंड उसकी चूत पर रखा और धीरे से अंदर किया। अनन्या ने आँखें भींच लीं। “आह्ह्ह… पूरा आ गया…” मैंने धीमे धक्के शुरू किए। अनन्या हर धक्के पर सिसकी भर रही थी।

“आह्ह… हाँ… रोहन… और गहरा… आह्ह…”

दरवाजे पर आहट हुई। माँ खड़ी थीं। तौलिया अभी भी लपेटा हुआ था। अनन्या ने आँखें खोलीं। “माँ… आ जाओ। मत खड़ी रहो।” माँ अंदर आईं और बिस्तर के किनारे बैठ गईं। उन्होंने अनन्या का हाथ पकड़ा।

“अनन्या… दर्द तो नहीं हो रहा?” अनन्या ने सिर हिलाया। “नहीं माँ… अच्छा लग रहा है… तुम देखो…”

मैं धक्के मारता रहा। अनन्या माँ का हाथ पकड़े कराह रही थी।

“आह्ह… माँ… रोहन अच्छा चोद रहा है… आह्ह…” माँ ने कुछ नहीं कहा। बस अनन्या के माथे से पसीना पोंछा। मैंने स्पीड थोड़ी बढ़ाई। अनन्या की चूत से आवाज आने लगी। “आह्ह… मैं झड़ने वाली हूँ… रोहन… मत रुक…”

अनन्या का शरीर तन गया। उसने माँ का हाथ जोर से दबाया और जोर से आह भरी।

“आह्ह्ह्ह… आ गया… आह्ह…” वो झड़ गई। मैंने अंदर ही रखा। अनन्या हाँफ रही थी। माँ ने उसके बाल सहलाए। “ठीक है?” अनन्या मुस्कुराई। “हाँ माँ… अब तुम्हारी बारी।”

माँ कुछ देर चुप रहीं। फिर तौलिया खोला। नंगी होकर बिस्तर पर लेट गईं।

“रोहन… आ जा। लेकिन धीरे। अनन्या यहीं रहेगी।” अनन्या बगल में लेट गई। माँ की टाँगें फैली हुई थीं। मैं उनके ऊपर चढ़ा। लंड उनकी चूत पर रखा। माँ ने अनन्या का हाथ पकड़ा। “अनन्या… मेरा हाथ मत छोड़ना।”

मैंने धीरे से अंदर किया। माँ की चूत अनन्या से ज्यादा टाइट थी। उन्होंने दाँत भींच लिए।

“आह्ह… रोहन… धीरे… आह्ह…” अनन्या ने माँ के स्तन को सहलाया। “माँ… छोड़ दो। अच्छा लगेगा।” माँ ने आँखें बंद कर लीं। मैंने पूरा लंड अंदर किया। माँ की लंबी कराह निकली। “आह्ह्ह… बेटा…”

मैंने धीमे धक्के शुरू किए। माँ हर धक्के पर सिसकी भर रही थीं।

“आह्ह… हाँ… ऐसे ही… आह्ह… रोहन…” अनन्या माँ के निप्पल चूस रही थी। माँ ने अनन्या के बाल सहलाए।

“अनन्या… तू भी… आह्ह…” मैंने माँ की गांड पकड़कर थोड़े गहरे धक्के मारे। माँ की टाँगें मेरी कमर पर चढ़ गईं। “और गहरा… आह्ह… लेकिन तेज मत… आह्ह…”

माँ की साँसें तेज हो गईं।

“रोहन… मैं झड़ने वाली हूँ… अनन्या… हाथ पकड़… आह्ह…” अनन्या ने माँ का हाथ जोर से पकड़ा। माँ का शरीर तन गया। उन्होंने जोर से आह भरी।

“आह्ह्ह्ह… आ गया… बेटा… आह्ह…” उनकी चूत ने लंड को कस लिया। वो काँपते हुए झड़ गईं।

मैंने बाहर निकाला। माँ हाँफ रही थीं। अनन्या उनके बगल में लेटी थी। तीनों की साँसें एक कमरे में गूँज रही थीं। माँ ने आँखें खोलीं। “आज बस इतना ही। तीनों लेट जाओ। कोई और नहीं करेगा।”

अनन्या मेरी एक तरफ लेट गई। माँ दूसरी तरफ। मैं बीच में था।

अनन्या ने मेरा हाथ पकड़ा। माँ ने दूसरा। कोई कुछ नहीं बोला। कमरे में सन्नाटा था। तीनों नंगे थे। और तीनों जानते थे कि ये रात यहीं खत्म नहीं हुई है। लेकिन आज के लिए बस इतना ही काफी था।

आपका लेखक..!!

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