पंडित जी की मदद से माँ को चोदा 1

Maa Beta Kamuk Chudai Story:- मैं, मेरी बड़ी बहन स्वाती (उनकी उम्र 26 साल है), मेरी मम्मी निर्मला (उनकी उम्र 46) और पापा जगजीत (उनकी 51 साल है)। और मैं मित्र 22 साल का हूँ। हम मिडिल क्लास फैमिली से बिलॉन्ग करते हैं। वैसे पैसे की कोई तकलीफ नहीं थी।

ये कहानी कुछ ही महीने पहले की है। मेरी दीदी 26 की हो चुकी थीं।

Maa Beta Kamuk Chudai Hindi Sex Story

दीदी ने ग्रेजुएशन किया था और वो घर का सब काम जानती थीं और बहुत ही सुंदर और सुशील थीं। पर उनकी शादी नहीं हो पा रही थी क्योंकि वो मांगलिक हैं और उनकी कुंडली में भी दोष था। आप तो जानते हैं कि ***** शादी में कुंडली का मिलना कितना ज़रूरी होता है। खैर उनकी शादी न होना मम्मी-पापा के लिए सबसे बड़ा चिंता का विषय था। हमने कई जगह रिश्ते की बात चलाई पर जहाँ-जहाँ कुंडली भेजी, जवाब में वहाँ से ना ही आता था।

पापा एक गवर्नमेंट एम्प्लॉई थे और उन्हें काम के सिलसिले में अक्सर बाहर रहना पड़ता था, पर 1 या 2 दिन से ज्यादा नहीं।

बात उस दिन की है जब मैं सोके उठा ही था और माँ-पापा आपस में दीदी की शादी की बात कर रहे थे। फिर कुछ देर बाद हमारे पंडित जी आए जो कि दीदी के लिए रिश्ता ढूँढ रहे थे। उन्होंने बताया कि दीदी की कुंडली में दोष है। पूजा करनी होगी और उनकी शुद्धि करानी होगी तब कोई मांगलिक लड़का दीदी के लिए ढूँढ कर उनकी शादी कराई जा सकती है। क्योंकि मांगलिक तो लड़के भी होते हैं पर दीदी की शादी न होने का कारण उनकी कुंडली का दोष था।

माँ और पापा उनकी बातें सुनकर खुश हुए और उस पूजा को फौरन कराने की बात रखी। तभी पंडित जी ने बताया कि ये पूजा 7 दिन तक चलेगी और यजमान की उपस्थिति होना ज़रूरी है। पापा ने कहा कि उन्हें 2-3 दिन से ज्यादा की छुट्टी नहीं मिलेगी। फिर तय ये हुआ कि मैं, दीदी, माँ और पंडित जी जाएँगे। पापा ने हमारा रिजर्वेशन 2 दिन के बाद का करा दिया।

हमने सारी तैयारी कर ली और निर्धारित समय पर स्टेशन पहुँच गए। ट्रेन शाम 7 बजे चलनी थी और सुबह 9 बजे हरिद्वार पहुँचाती थी। पंडित जी वहीं स्टेशन पर आ गए थे। फिर पापा ने हमें अपने कोच में बिठाया और चले गए। जाते वक्त उन्होंने मुझे कुछ पैसे दिए और कहा कि माँ का और दीदी का ख्याल रखूँ।

जब ट्रेन चली तो हम अपने-अपने स्थान पर बैठ गए और बातें करने लगे। हमारे कम्पार्टमेंट में 1 कपल और था। वो कपल खिड़की वाली सीट पर आमने-सामने बैठा था और वो अपनी बातों में ही बिज़ी थे। माँ और दीदी और वो लेडी एक साइड थे और मैं, पंडित जी और वो तीसरा आदमी एक साइड थे। मैं माँ के सामने था।

बातों-बातों में मैंने देखा पंडित जी माँ की तरफ कुछ ज्यादा ही देख रहे थे। मुझे बड़ा अनकंफर्टेबल फील हो रहा था और शायद माँ को भी। वो कभी माँ के बूब्स की ओर देख रहे थे तो कभी जाँघों की ओर। और जब भी माँ किसी काम से खड़ी होतीं तो वो उनकी कमर और उनकी हिप्स को देख रहे थे। मुझे बड़ा गुस्सा आ रहा था पर मैंने अपने आप पर काबू बनाए रखा।

कुछ समय बाद जब भी वो माँ की तरफ देखते तो मैं भी देखता कि वो कहाँ देख रहे हैं। इसके चलते मैं भी न जाने कब माँ की बॉडी देखने लगा। मैंने नोटिस किया कि माँ के बूब्स हेवी थे और उनके हिप्स भी बड़े और गोल थे और उनका पेट भी थोड़ा सा बाहर था। उनकी स्किन फेयर थी। वो अपनी बॉडी का ध्यान अच्छे से रखती थीं। उनके फेस पर गोल बड़ी लाल बिंदी खूब सज रही थी और वो अचानक मुझे बहुत ही खूबसूरत लगने लगी थीं। इस पंडित ने मेरा माँ की तरफ देखने का नज़रिया बदल दिया था।

रात हमने खाना खाया और सोने की तैयारी करने लगे। मैं और पंडित जी सबसे ऊपर की बर्थ पर सोए। माँ और दीदी बीच की बर्थ पर और वो कपल नीचे वाली बर्थ पर सो गए।

सुबह जब उठे तो देखा माँ और दीदी जागी हुई थीं और पंडित जी भी जागे हुए थे। वो कपल शायद कहीं उतर गया होगा, क्योंकि दीदी और माँ विंडो सीट पर बैठी थीं। पंडित जी माँ की तरफ ही देख रहे थे और शायद मन ही मन माँ के शरीर को पाने की कामना कर रहे थे। माँ ने ग्रीन कलर की साड़ी पहनी थी और सेम कलर का ब्लाउज। माँ का शायद ध्यान नहीं था पर उनका लेफ्ट बूब पूरी तरह से कपड़े के ऊपर से एक्सपोज़्ड था। वो शायद पल्लू कुछ ज्यादा ही चढ़ गया होगा, क्योंकि पंडित उसे घूरे जा रहा था। माँ का बूब काफी बड़ा दिख रहा था और वो उनकी उम्र के हिसाब से ढीला भी नहीं लग रहा था।

कुछ ही देर में हम हरिद्वार पहुँच गए। हमने वहाँ एक आश्रम में किसी से कह के बुकिंग करवा रखी थी। वो आश्रम हर की पौड़ी (मेन गंगा घाट) से दूर था। जब हम वहाँ पहुँचे तो देखा वो एक बहुत बड़ा आश्रम है और रहने-खाने-पीने की अच्छी व्यवस्था थी। हमने 2 कमरे लिए – एक में पंडित जी और दूसरे में हम तीनों।

फिर पंडित जी ने कहा कि अभी आराम कर लो, और शाम 5:30 बजे गंगा घाट जाएँगे और पूजा का आरंभ करेंगे। हमने दोपहर को खाना खाया और फिर सो गए। 5 बजे माँ ने हमें जगाया और जल्दी तैयार होने को कहा। मैं तुरंत नहाके बाहर निकल गया, क्योंकि माँ और दीदी को भी तैयार होना था। जब वो दोनों बाहर निकलीं तो दोनों एक जैसी ही साड़ी पहन रखी थीं – क्रीम कलर की गोल्डन बॉर्डर वाली, जैसी हम अक्सर पूजा में पहनते हैं। वो दोनों बहुत सुंदर लग रही थीं, और पंडित जी पहले की तरह माँ को घूरे जा रहे थे और माँ उनके ऐसे बर्ताव से परेशान थीं।

खैर हम घाट पर चले गए। वो उस आश्रम का निजी घाट था। आश्रम में रहने वाले लोग सुकून से स्नान और पूजा कर सकते थे। पंडित जी ने सारी तैयारी कर रखी थी। वहाँ हम गए। माँ और दीदी को पूजा के स्थान पर बिठाया और मंत्र जाप शुरू किया। मैं वहाँ बैठे सब देख रहा था। माँ मेरे सामने बैठी हुई थीं। मैंने देखा कि माँ वाकई बहुत सुंदर और सेक्सी हैं, और उनकी उम्र और लुक्स का कोई मुकाबला नहीं है।

फिर कुछ देर बाद पूजा कराने के बाद पंडित जी ने कहा कि अब आपकी शुद्धि मंत्रों से हो गई है। अब पंडित जी ने कहा कि नदी में डुबकी लगाके आइए तो माँ ने कहा—

माँ: पंडित जी हमारे पास कपड़े नहीं हैं यहाँ।

तो उन्होंने कहा—

पंडित जी: अभी पूजा समाप्त नहीं हुई। आपको यहाँ फिर से आकर बैठना है।

वो बिना कुछ बोले पानी में उतर गईं और डुबकियाँ लगाने लगीं। जब वो बाहर आईं तब मैं समझा पंडित जी की चाल क्या थी। साड़ी पूरी भीगने की वजह से मम्मी और दीदी का ज्यादातर हिस्सा विजिबल हो गया था। दीदी ने काले कलर की ब्रा पहनी थी और माँ ने सफेद। माँ के बूब्स एकदम उभर के आ रहे थे, और गीले पन की वजह से साड़ी शरीर से चिपक गई थी और माँ की बॉडी का पूरा शेप दिख रहा था। बहुत ही मन मोहित करने वाला दृश्य था। माँ का पेट हल्का सा बाहर दिख रहा था, उनकी गाँड बड़ी थी, जाँघें मोटी-मोटी भरी हुईं। गीले पन की वजह से उनकी पैंटी का कलर तो नहीं पर पैंटी लाइन साफ नज़र आ रही थी।

खैर दीदी की तरफ मैंने इतना ध्यान नहीं दिया पर मेरी नज़र माँ से हट ही नहीं रही थी। पंडित जी का तो हाल बुरा हो चुका था। वो माँ को देखके कुछ ज्यादा ही एक्साइटेड हो चुके थे। घड़ी-घड़ी अपना लंड धोती में एडजस्ट कर रहे थे। मुझे उन पर गुस्सा तो बहुत आया पर मैं कुछ बोला नहीं।

रात करीबन 7:30 बजे हम वहाँ से चले। पंडित जी ने कहा खाना खाके जल्दी सो जाना, सुबह 6 बजे पूजा फिर से शुरू करनी है। पंडित जी इतना कहके चले गए। मैंने माँ से कहा—

मैं: मैं जरा बाहर घूमके आता हूँ।

जब मैं बाहर निकला तो मैंने देखा पंडित जी पैंट-शर्ट पहनके कहीं जा रहे थे। मुझे कुछ गड़बड़ लगी। मैं उनके पीछे गया। थोड़ी देर चलने के बाद देखा तो पंडित जी एक जगह में घुस गए। अंदर जाकर देखा तो वो एक गैरकानूनी शराब की दुकान थी, और वहाँ बैठके पीने की व्यवस्था भी थी। पंडित जी ने वहाँ से 2 क्वार्टर खरीदे, गटागट पी गए। उसके बाद वो वहाँ से निकल गए और आगे चलने लगे। मैं भी उनके पीछे चला जा रहा था।

थोड़ी देर चलने के बाद पंडित जी एक घर में चले गए। वो बहुत पुराना सा घर था। मैं अंदर तो नहीं जा पाया पर अंदर देखने के लिए बेताब था। फिर मैं उस मकान के पीछे जाके देखा तो एक दीवार में बड़ा सा छेद था। जब मैंने उसमें से झाँकके देखा तो दंग रह गया।

पंडित जी और एक औरत जो कि अधेड़ उम्र की होगी अपनी बाहों में भर रहे थे। उन्होंने शर्ट उतार ली थी और सिर्फ पैंट में थे। वो औरत पंडित जी से लंबी थी। उसके बूब्स बड़े-बड़े थे, पर ढीले लग रहे थे। पंडित जी उससे अपने बाहों में भरके उससे चूम रहे थे, उसके बूब्स को दबा रहे थे, और वो एकदम मस्त होके उस औरत की आगोश में खो चुके थे। देखते ही देखते उन्होंने उस औरत के साथ कुछ देर चुम्मा-चाटी करने के बाद उसे लिटाके, उसका घाघरा उठाया और अपना लंड उसकी चूत में घुसाके झटके मारने लगे।

मेरा लंड एकदम सख्त हो गया था ये सब देखके और मैंने अपने लंड को अपनी पैंट से बाहर निकालकर सहलाने लगा। धीरे-धीरे उनकी चुदाई तेज होने लगी और पंडित जी जोर-जोर से झटके लगाने लगे। फिर उन्होंने और तेजी से चुदाई शुरू की और कुछ देर बाद उनका शरीर अकड़ गया। मैं समझ गया कि पंडित जी झड़ गए। मेरा भी पानी तब तक निकल चुका था। फिर मैंने अपने लंड अंदर किया और देखने लगा कि अंदर क्या हो रहा है। पंडित जी ने अपने कपड़े पहने और वहाँ से चलते वक्त उन्होंने उस औरत को पैसे दिए। तब मुझे पता चला कि वो औरत एक वेश्या थी।

पंडित जी आश्रम में आ गए और उनके पीछे-पीछे मैं भी लौट आया। रात हम सबने खाना खाया। पंडित जी ने भी आश्रम के हॉल में खाना खाया और फिर माँ और दीदी ऊपर रूम में चले गए। मुझे एक जगह बैठे देख पंडित जी मेरे पास आए और यहाँ-वहाँ की बातें करने लगे। फिर हम दोनों भी अपने-अपने रूम में सोने चले गए।

आश्रम के रूम में कोई बेड नहीं था। जब मैं रूम में पहुँचा तो देखा कि दीदी दीवार की साइड सो रही थीं और माँ उनके पास और मेरा बिस्तर भी माँ के पास ही था। मैं वहाँ चुपचाप सो गया। मैंने देखा कि माँ और दीदी गहरी नींद में हैं, और अब मेरे मन में माँ के लिए अलग विचार आने लगे थे।

बहुत कोशिश के बाद भी मैं सो नहीं पाया। फिर कुछ देर बाद मैंने माँ को छूने का सोचा। मैं जानता था कि मैं अपनी मौत को बुलावा दे रहा हूँ। मैंने धीरे से माँ के हाथ के ऊपर हाथ रखा, और सच बताऊँ दोस्तों मुझे ऐसा लगा जैसे धड़कन वहीं रुक गई है। फिर कुछ देर तक जब कोई हरकत नहीं हुई तो मैं उनका हाथ सहलाने लगा, और मुझे बहुत अच्छा लगने लगा था। मुझे डर के साथ अब थोड़ा साहस भी आने लगा था।

फिर मैंने अपना हाथ उनके पेट पर रखा। ओह दोस्तों कितना मुलायम था। मैंने अपना हाथ काफी देर तक हिलाया नहीं। जब कोई हरकत न हुई तो मैं उनका पेट सहलाने लगा। एकदम सॉफ्ट स्किन थी उनकी बेली की। उनकी नेवल डीप थी, और मैं उसमें अपनी उंगली घुमा रहा था। ऐसा लग रहा था कि मैं स्वर्ग में आ गया हूँ। मैं बहुत देर तक ऐसे ही उनकी बेली फील करता रहा। मुझे कब नींद आई मुझे पता नहीं चला।

सुबह करीब 5 बजे माँ ने मुझे उठाया और तैयार होने को कहा। मैं जल्दी से उठके तैयार हो गया, और फिर दीदी नहाने चली गईं। जब दीदी नहा रही थीं, तो मैंने देखा कि माँ मुझे देखकर कुछ ज्यादा ही मुस्कुरा रही हैं। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। खैर जब हम तैयार होके बाहर निकले तो पंडित जी बाहर ही खड़े थे। हम पूजा के स्थान पर गए। वहाँ हमने देखा कि भगवा रंग के कुछ कपड़े पड़े हुए हैं। पंडित जी ने बताया कि ये शुद्ध किए हुए वस्त्र आप दोनों यानी माँ और दीदी को पहनने होंगे, पर अभी आप इन्हीं कपड़ों में रहें।

फिर कुछ देर मंत्र पढ़कर उन्होंने माँ और दीदी से कहा कि आप पानी में डुबकी लगाके आ जाओ और ये जो वस्त्र हैं वो पहन लो। जब माँ और दीदी डुबकी लगाके वो वस्त्र पहनके आए तो मैं तो देखता ही रह गया। मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। वो वस्त्र सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट थे और एक चुन्नी थी, और वो दोनों साइज़ से छोटे थे। माँ के बूब्स ब्लाउज में आधे भी समा नहीं पा रहे थे, और पेटीकोट बिल्कुल उनकी बेली के नीचे था, और शायद उन्होंने अंडर कुछ नहीं पहना था इसलिए उनकी गाँड पेटीकोट में समा नहीं पा रही थी। यही हाल दीदी का भी था।

खैर मैं तो अपनी माँ पर ही नज़रें गड़ाए हुए था। उन्होंने किसी तरह उस चुन्नी जैसे कपड़े से अपना काम चलाया। फिर पंडित जी आए और पूजा शुरू कर दी। अब हवन हो रहा था, और जैसे ही माँ आहुति देने के लिए हाथ हवन कुंड की ओर ले जातीं उनके बूब्स छाती से बाहर आने की कोशिश करते थे। मेरा उन्हें इस हाल में देखके लंड खड़ा हो गया, और पंडित जी भी यही कर रहे थे। खैर माँ ने शायद मुझे लंड एडजस्ट करते हुए देख लिया था। मैं घबरा गया पर कुछ कहा नहीं वहीं बैठा रहा।

जब हवन खत्म हुआ तो नारियल डालने के लिए सब खड़े हो गए। पंडित जी सामने थे, दीदी और माँ पास-पास खड़े हुए थे और मैं माँ के पीछे खड़ा था। फिर पंडित जी ने कहा कि नारियल की आहुति के समय परिवार के सभी लोग जिस पर नारियल रखकर आहुति देते हैं उसे हाथ लगाएँ। मैंने पीछे से उस लकड़ी को पकड़ा था। मेरे माँ के पीछे होने की वजह से मेरा लंड माँ की गाँड से सटा हुआ था। फिर पंडित जी मंत्र जाप करने लगे और मैं अपना लंड माँ की गाँड से सटाए वैसे ही खड़ा था और उनकी मोटी-मुंसल गाँड पर अपने लंड के स्पर्श का आनंद ले रहा था।

फिर कुछ देर बाद जब नारियल की आहुति देने लगे तो माँ और दीदी झुकके उसे हवन कुंड में डाल रहे थे। इस सूरत में माँ की गाँड मेरे लंड से एकदम सट गई। मैं भी पीछे नहीं हटा और अपने आपको आगे की ओर किया, और झुकने के बहाने मैंने लंड और माँ की गाँड में और अंदर घुसा दिया। मुझे लगा मैं सातवें आसमान पर हूँ। जब सब ठीक से खड़े हुए तो मैं माँ से दूर हटके खड़ा हो गया। माँ ने मेरी तरफ देखा। मुझे लगा शायद वो गुस्सा करेंगी, पर उन्होंने कोई रिएक्शन नहीं दिया।

और कुछ देर बाद पंडित जी ने कहा कि आप तीनों एक बार नदी में डुबकी लगाके आओ और माँ और दीदी से कहा कि आप अपने दूसरे कपड़े पहन लेना। जब हम पानी में गए तो माँ की पीठ मेरे सामने थी। जैसे ही माँ ने पहली डुबकी लगाई, गीले पन की वजह से माँ की गाँड का शेप एकदम साफ दिख रहा था। इतनी पास से मैंने माँ की गाँड नहीं देखी थी। मेरा लंड एकदम खड़ा हो गया था। माँ भी आराम से डुबकी लगा रही थीं, और मुझे उनकी पीठ, कमर और गाँड के अच्छे दर्शन हो रहे थे।

जब डुबकी लगाने के बाद माँ पलटीं तो मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा। उन्होंने चुन्नी हटा दी थी, और उनके बड़े बूब्स मेरी आँखों के सामने थे। उनके बूब्स का सिर्फ 30-40% हिस्सा अंदर था बाकी पूरा बाहर था। मेरा दिल कर रहा था कि मैं वहीं उनके बूब्स को भींच दूँ। फिर माँ ने मेरी तरफ देखा एक ब्लैंक लुक दिया और वहाँ से चली गईं। मैं भी पानी से निकलकर बाहर आकर खड़ा हो गया। कुछ देर बाद जब माँ और दीदी आए तो हम आश्रम की ओर बढ़ चले। फिर वहाँ हमने खाना खाया और पंडित जी ने माँ से कहा कि शाम 5 बजे फिर से पूजा शुरू होगी।

खाना खाने बाद हम रूम में सोने चले गए। पंडित जी भी अपने रूम में चले गए। शाम करीबन 4:30 बजे माँ ने जगाया और तैयार होने को कहा। मैं तैयार होके बाहर चला गया। कुछ देर में दीदी और माँ भी आ गईं। पंडित जी भी तैयार थे। हम घाट पर आ गए। पंडित जी ने माँ से कहा—

पंडित जी: अब यहाँ से पूजा थोड़ी कठिन हो जाएगी और थोड़ा परिश्रम भी करना रहेगा।

माँ: पंडित जी स्वाती की कुंडली का दोष हटाने के लिए जो विधि आप सही समझें वो करें। हम आपका पूरा साथ देंगे।

फिर माँ और दीदी अपने-अपने स्थान पर बैठ गईं और पंडित जी ने विधि शुरू कर दी। कुछ देर बाद पंडित जी ने उन्हें कहा कि अब आप दोनों पानी में डुबकी लगा आओ और वो भगवे वस्त्र पहन लो। वो दोनों डुबकी लगाने चली गईं। पंडित जी ने माँ को बुलाया और उन्हें एक धागा दिया। उस धागे में एक मोटी गोल करीबन 3 इंच की लकड़ी बँधी हुई थी। पंडित जी ने उन्हें कहा—

पंडित जी: स्नान के बाद इसे तुम और स्वाती अपनी नाभि पर पहन लेना, और जब तक पूजा का समापन न हो इसे उतारना नहीं।

माँ ने उनसे अपना और दीदी का धागा लिया और डुबकी लगाने चली गईं। जब वो दोनों डुबकी लगाके आईं तो पानी में भीगने की वजह से कामुक तो लग ही रही थीं। मैंने देखा कि माँ की ब्लाउज के ऊपर का एक हुक भी नहीं था। मैं समझ गया कि जरूर ये पंडित की ही कारस्तानी होगी। आज माँ के 70% बूब्स बाहर थे और चुन्नी होते हुए भी वो उसमें समा नहीं पा रहे थे।

जब वो आए तो मैंने देखा कि उन्होंने वो धागा कमर पर बाँध लिया तो और वो बाहर की ओर था। पंडित जी ने कहा—

पंडित जी: बेटी निर्मला इस लकड़ी के टुकड़े को अंदर की ओर ही रहने देना।

माँ ने सुनते ही उसे अपने घाघरे के अंदर कर दिया और दीदी को भी अंदर करने को कह दिया। जैसे ही वो दोनों उस धागे को और उससे बँधी लकड़ी को अंदर करके बैठ गए, लकड़ी ने अपना काम शुरू कर दिया। अंदर कुछ न पहना होने की वजह से लकड़ी सीधा दोनों की चूत पर लग रही थी। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि दोनों के चेहरों पर एक अजीब सा भाव आ रहा था, जो आनंद और शर्म दोनों दिखा रहा था। काफी देर तक वो दोनों उस लकड़ी से जूझती रहीं और जब शाम की पूजा समाप्त हुई और वो खड़े हुए तो मेरे होश का कोई ठिकाना नहीं था। जैसे ही माँ और दीदी पलटीं तो उनकी गाँड के थोड़ा नीचे का भाग गीला था। शायद लकड़ी की वजह से वो झड़ चुकी थीं या एकदम कामुक हो चुकी होंगी। पंडित जी ने भी मन ही मन एक गंदी सी मुस्कान दी उस गीले भाग को देखकर और वहीं घूरे जा रहे थे।

खैर जब वो दोनों नहाके कपड़े पहनके आए तो काफी शांत लग रहे थे, और थके हुए भी। पंडित जी ने उन्हें आराम करने को कहा और भोजन पर मिलने की बात भी कही। जैसे ही हम आश्रम पहुँचे मैंने देखा पंडित जी पैंट-शर्ट पहनके चल पड़े। मैं जानता था कि वो कहाँ जाएँगे। पंडित जी वैसे ही पहले शराब के अड्डे पर गए और वहाँ से उस घर में चले गए उस वेश्या के पास। मैंने दूर से देखा तो पंडित जी आज कुछ लड़खड़ाते हुए आ रहे थे। शायद उन्होंने शराब ज्यादा पी ली थी। जैसे ही वो घर में घुसे मैं घर के पीछे की ओर चला गया और उस छेद से अंदर देखने लगा।

पंडित जी आए और उस औरत को अपनी बाहों में भर लिया और उसे चूमने लगे। फिर पंडित जी ने बिना देर किए उसे लिटाया और उसकी चूत में अपना लंड पेलके उसे जोर-जोर से चुदने लगे। आज वो बड़े और लंबे झटके लगा रहे थे, और उन्होंने उसका ब्लाउज खोला और उसके बूब्स को जोर-जोर से मसलने लगे। आज पंडित जी बहुत ज्यादा ही कामुक थे शायद। उनकी आवाज तो नहीं आ रही थी पर जिस तरीके से वो औरत उनका साथ दे रही थी लग रहा था कि दोनों ही सातवें आसमान पर हैं। मैं भी अपना लंड बाहर निकाला सहला रहा था और पंडित जी की रासलीला देखकर मजे ले रहा था।

तभी मैंने देखा कि पंडित जी के झटके तेज हो गए हैं और वो जोर-जोर से अपना लंड उस औरत की चूत में पेल रहे थे। मैं उनकी चुदाई देखके झड़ गया, और पंडित जी अभी भी लगे हुए थे। तभी अचानक सामने का दरवाजा खुल गया, और एक आदमी अंदर आ गया। वो औरत उसे देखके घबरा गई और अपने कपड़े ठीक करके घुटनों के बल बैठके उसके हाथ जोड़ने लगी। शायद वो उसका पति होगा और उसे इन सब बातों के बारे में पता नहीं होगा। उसने फिर उस औरत को लातें मारीं और थप्पड़ पर थप्पड़ मार रहा था। पंडित जी वहीं बैठे हुए थे अपने हाथ जोड़े। फिर उस आदमी ने पंडित जी उठाया और उन्हें पहले तो थप्पड़ बाद में लातों और घूसों से मार-मारके लाल कर दिया था। फिर उस आदमी ने पंडित जी को धक्के मारके वहाँ से निकाल दिया। पड़ोस के 2-4 लोगों ने भी पंडित जी के ऊपर अपना हाथ साफ कर लिया।

वैसे आप सबको बता दूँ कि हमारे शहर में पंडित जी का बड़ा नाम था, और सब उनकी इज्जत किया करते थे और उनका ये स्वरूप अगर सबके सामने आ जाता तो उनका शहर में रहना मुश्किल था। खैर पंडित जी ने अपने आपको सँभाला और आश्रम में आ गए। मैं भी उनके पीछे-पीछे आश्रम तक आ गया। वो अपने कमरे में चले गए। कुछ देर बाद जब खाना खाने सब हॉल में इकट्ठा हुए तो पंडित जी भी वहाँ आए। उनके चेहरे पर तो कोई चोट नहीं थी पर चेहरा थप्पड़ों की वजह से लाल था, और वो ठीक से चल भी नहीं पा रहे थे। माँ ने जब उनसे पूछा तो उन्होंने बताया कि रास्ते में एक गाड़ी ठोकर मारके चली गई।

जब खाना खाके माँ और दीदी ऊपर चले गए तो मैं वहीं नीचे बैठा हुआ था। मुझे बैठा हुआ देख पंडित जी भी मेरे पास आ गए और बातें करने लगे। बातों-बातों में वो माँ की बहुत तारीफ करने लगे। मुझे गुस्सा आया और मैंने उनसे कहा—

मैं: लगता है मार कम पड़ी है जो अभी भी औरतों के खयाल जेहन से जा नहीं रहे हैं।

वो ये मेरे मुँह से सुनने के बाद अपने होश में ही नहीं थे, और उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वो क्या-क्यों-कैसे कहने लगे। मैंने कहा—

मैं: बनो मत। मैं सब जानता हूँ कि तुम शाम में पूजा के बाद शराब पीते हो और वेश्या के पास भी जाते हो, और आज तो उसके पति और दूसरे लोगों ने उसकी जमके पिटाई भी की है।

वो मेरे आगे हाथ जोड़ने लगा और माफी माँगने लगा और किसी से न कहने की दुहाई करता रहा। मैंने उससे कहा—

मैं: एक शर्त पर। पहले तो ये बता कि तुम यहाँ पूजा के चक्कर में आए हो या कोई और बात है?

तो उसने बताया कि वो मेरी माँ के प्रति कामवासना रखता था, और माँ को अपने चंगुल में फँसाने के लिए ही यहाँ लाया था, और मेरे आने की उम्मीद नहीं थी उससे, इसलिए उसका काम हो नहीं पा रहा था। उसने बताया कि उसने दीदी के लिए एक रिश्ता ढूँढ रखा है। ये पूजा तो मेरी माँ को फँसाने के लिए रखी थी।

ये सब सुनकर मैंने उससे एक करारा थप्पड़ मारा और बहुत सारी गालियाँ दीं और शहर में उसकी ये करतूत के बारे में बताने की धमकी भी दी। वो मेरे पाँव में गिर गया और रोने लगा और माफी माँगने लगा। फिर मैंने उससे कहा—

मैं: मेरी माँ और बहन का खयाल अपने दिल से निकाल दो।

और जो दूसरी बात मैंने बोली वो मुझे देखता ही रह गया। मैंने कहा उससे—

मैं: कि मैं अपनी माँ को पाना चाहता हूँ, पर जोर-जबरदस्ती से नहीं प्यार से, और तुम मेरी मदद करोगे।

और फिर मैंने उससे दूसरा थप्पड़ मारा क्योंकि आज जो मेरी अपनी माँ को पाने की चाहत थी वो भी उसी की वजह से थी। उसके पास कोई चारा नहीं था। वो मेरी सारी बात मान रहा था। फिर मैं सोने चला गया, और जाते-जाते मैंने उससे कह दिया—

मैं: अब अगले 5 दिन में मेरा काम हो जाना चाहिए।

अब वो मेरे पालतू कुत्ते जैसा हो गया था। जब मैं रूम में पहुँचा तो देखा कि माँ और दीदी सो चुकी हैं। मैं भी सोने चला गया। जैसे ही मैं लेट रहा था मैंने देखा माँ की साड़ी घुटनों तक ऊँची हो गई है, और उनकी गोरे कोमल पाँव जीरो बल्ब से आती रोशनी से साफ दिख रहे थे। मैं सोया नहीं और माँ के पाँव के पास बैठ गया, और उन्हें देखने लगा। मेरा बहुत मन कर रहा था कि मैं माँ के पाँव का स्पर्श करूँ पर हिम्मत जुटा नहीं पा रहा था।

कुछ देर सोचने के बाद मैंने माँ के पाँव को हाथ लगाया। मेरा शरीर ठंडा पड़ गया। मुझे डर भी लग रहा था और मजा भी आ रहा था। मैंने कुछ देर अपना हाथ माँ के पाँव पर बिना हिलाए रहने दिया और फिर कुछ देर बाद हल्के-हल्के उनके पाँव को महसूस करने लगा। माँ की टाँगों पर एक भी बाल नहीं था। शायद यहाँ आने से पहले उन्होंने वैक्सिंग कराई होगी। खैर मैं अपना हाथ हल्के-हल्के माँ के पाँव पर घुमा रहा था। मेरा लंड एकदम खड़ा हो गया था, और मैं अपना हाथ पाँव के नाखून से लेकर घुटनों तक घुमा रहा था। मुझे बड़ा मजा आ रहा था, और मेरे लंड से प्रीक्यूम भी शायद निकल रहा था। मैं अपने ही खयालों में खोया हुआ था कि अचानक माँ उठ गईं, और मेरा हाथ पकड़ लिया। मेरी तो जैसे साँसें ही रुक गईं। मैं कुछ भी नहीं बोला और अपनी मौत का इंतजार कर रहा था।

माँ: बेटा तुम ये क्या कर रहे हो?

मैंने हिचकिचाते हुए कहा—

मैं: माँ मैं आपके पाँव दबा रहा था।

उन्होंने गुस्से में पूछा—

माँ: क्यों?

मैं: कि मुझे लगा कि आप दिन भर पूजा में बैठके थक गई होंगी तो दबाने से आराम मिलेगा।

और मैंने उनसे कहा—

मैं: आपकी नींद कैसे खुल गई?

तो कहने लगीं—

माँ: बेटा ये जो लकड़ी बँधी है पंडित जी ने उससे काफी तकलीफ होती है सोने में।

मैं: आप सो जाओ मैं पाँव दबा देता हूँ।

फिर उन्होंने कहा—

माँ: मेरा बेटा मेरा कितना ख्याल रखता है।

मैं: माँ ये तो मेरा फर्ज है।

फिर उन्होंने कहा—

माँ: बेटा तू भी तो हमारे साथ पूजा में लगा रहता है, तू भी तो थक गया होगा। चल सो जा।

मैं माँ के पास आकर सो गया और भगवान से मेरी जान बख्शने के लिए धन्यवाद करने लगा।

सुबह माँ ने मुझे 5 बजे जगाया और तैयार होने को कहा। मैं जल्दी से तैयार हो गया और फिर दीदी नहाने चली गईं। माँ आज मेरा बड़ा ख्याल रख रही थीं, और बात-बात पर मेरी तारीफ कर रही थीं। शायद वो नहीं जानती थीं कि उनका बेटा उन पर बुरी नज़र गड़ाए हुए है।

खैर जब हम नीचे आए तो पंडित जी हमारा इंतजार कर रहे थे, और मुझे देखके उन्होंने अपनी नज़रें नीचे कर लीं। हम घाट पर आए तो माँ और दीदी पूजा स्थान पर बैठ गए, और पंडित जी ने पूजा शुरू कर दी। आज वो अपना पूरा ध्यान मंत्र और पूजा पर लगाए हुए थे। उन्होंने माँ और दीदी की तरफ देखना भी छोड़ दिया था।

कुछ देर बाद पंडित जी ने माँ से कहा—

पंडित जी: अब थोड़ी देर पूजा में स्वाती की जरूरत नहीं है, और उसे आश्रम भेज दिया जाए।

और माँ से कहा—

पंडित जी: अब आगे की विधि में आपके सुपुत्र और आपका काम है।

मैं समझ गया कि वो मेरे लिए प्लेटफॉर्म तैयार कर रहा है। फिर मैंने पंडित से इशारे में कहा कि दीदी की नाभि से लकड़ी खुलवा दे। वो तुरंत माँ से बोला—

पंडित जी: स्वाती की नाभि पर अब इस धागे की जरूरत नहीं है।

माँ ने पूछा—

माँ: ऐसा क्यों?

तो पंडित जी बोले—

पंडित जी: बाकी की विधि में आपसे संपन्न कर लूँगा।

दीदी ने जाते वक्त वो धागा पंडित जी को दे दिया और वो आश्रम की ओर चल पड़ीं। अब पंडित जी ने माँ से कहा—

पंडित जी: अब की पूजा में आपका विधिपूर्वक स्नान और शुद्धि होनी है।

माँ ने कहा—

माँ: वो तो हम करते ही हैं ना।

तो उन्होंने बताया—

पंडित जी: आगे की पूजा में और कठिन परिश्रम करने होंगे और मात्र डुबकी लगाने से शुद्धि नहीं होगी।

तो माँ ने पूछा—

माँ: कैसे करना होगा?

तो पंडित जी ने बताया—

पंडित जी: तुम्हें पहले दिव्य जड़ी-बूटी वाला तेल लगाना होगा फिर स्नान करना होगा।

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