जोर की बारिश में घर में अकेले दीदी और भाई। भीगी साड़ी में दीदी की चुचियाँ चिपक गईं तो भाई ने रोक न पाया। पहले चूत चोदी, फिर गांड फाड़ी। पूरी रात दीदी की दोनों छेद में लंड चला। असली भाई-बहन सेक्स स्टोरी।
उस दिन सुबह से ही बादल घिरे हुए थे। मैं छत पर बैठा मोबाइल चला रहा था तभी अचानक जोर की बारिश शुरू हो गई। पानी ऐसे बरस रहा था जैसे आसमान फट गया हो। मैं जल्दी से नीचे भागा। घर में सिर्फ मैं और दीदी ही थे। मम्मी-पापा गाँव गए हुए थे दो दिन के लिए। दीदी की उम्र सत्ताईस है, मेरी बाईस।
दीदी रसोई में खड़ी चाय बना रही थी। उसकी साड़ी भीग चुकी थी क्योंकि वह अभी-अभी आँगन से अंदर आई थी। पतली सफेद साड़ी शरीर से चिपक गई थी। ब्लाउज के अंदर उसकी बड़ी-बड़ी चुचियाँ साफ दिख रही थीं। निप्पल की शेप तक साफ नजर आ रही थी। मैंने देखा और मेरा लंड तुरंत सख्त हो गया।
दीदी ने मेरी तरफ देखा और बोली, “क्या देख रहा है चुपचाप? जा कपड़े बदल के आ, भीग जाएगा।”
मैंने कुछ नहीं कहा। बस नहा Offline में जाकर कपड़े बदले। लेकिन मन में दीदी की भीगी हुई साड़ी और उसकी चुचियाँ घूम रही थीं। जब वापस आया तो दीदी बैठक में खिड़की के पास खड़ी बारिश देख रही थी। साड़ी अभी भी गीली थी। उसने पल्लू ठीक किया तो उसकी कमर और गांड की शेप साफ झलक गई।
मैं पास जाकर खड़ा हो गया। दीदी ने बिना मुझे देखे कहा, “बारिश कितनी जोर से हो रही है… याद है बचपन में ऐसे ही भीगते थे दोनों?”
मैंने हल्के से हाँ में जवाब दिया। मेरी नजर उसकी चुचियों पर थी। साड़ी गीली होने की वजह से ब्लाउज के बटन के बीच से थोड़ी सी फांकी दिख रही थी। मेरा लंड जींस में तड़प रहा था।
थोड़ी देर बाद बिजली चली गई। पूरा घर अंधेरा हो गया। सिर्फ बारिश की आवाज आ रही थी। दीदी बोली, “चल मोमबत्ती जलाते हैं।”
हम दोनों रसोई में गए। दीदी ने मोमबत्ती जलाई। रोशनी में उसकी भीगी साड़ी और भी सेक्सी लग रही थी। मैं पीछे से उसके काफी करीब खड़ा हो गया। मेरी साँस उसकी गर्दन पर पड़ रही थी। दीदी ने महसूस किया लेकिन कुछ नहीं बोली।
मैंने हिम्मत करके उसकी कमर में हाथ डाल दिया। दीदी का शरीर一时 कठोर हो गया। उसने धीरे से कहा, “क्या कर रहा है?”
मैंने जवाब नहीं दिया। बस हाथ आगे बढ़ाकर उसकी पेट पर फेरा। फिर धीरे-धीरे ऊपर की तरफ। ब्लाउज के अंदर हाथ डाल दिया। उसकी चुची बिना ब्रा के थी। नरम और भारी। निप्पल पहले से ही सख्त था। मैंने निप्पल को उँगलियों में लेकर मरोड़ा।
दीदी ने साँस छोड़ते हुए कहा, “छोड़… पागल हो गया है क्या… मैं तेरी दीदी हूँ।”
लेकिन उसकी आवाज में मना करने वाला जोर नहीं था। मैंने दूसरी चुची भी पकड़ ली। दोनों हाथों से उसकी चुचियाँ दबा-दबा कर मरोड़ने लगा। दीदी की साँसें तेज हो गईं। उसकी कमर मेरे लंड से छू रही थी। जींस के अंदर मेरा लंड पूरी तरह सख्त हो चुका था।
मैंने उसके बाल हटाकर गर्दन चूमनी शुरू कर दी। दीदी ने आँखें बंद कर लीं। मैंने कान के नीचे जीभ फेरी तो उसका शरीर काँप गया। मैंने ब्लाउज के हुक खोले। दोनों चुचियाँ बाहर आ गईं। मोमबत्ती की रोशनी में उसकी गोरी चुचियाँ और काले निप्पल चमक रहे थे। मैंने एक चुची मुँह में ले ली और जोर से चूसने लगा।
“आह… धीरे… दाँत मत लगा…” दीदी कराह उठी।
मैंने दूसरी चुची भी चूसी। दोनों निप्पल को बारी-बारी से मुँह में लेकर चूसता और जीभ घुमाता रहा। दीदी की पीठ मेरे सीने से सटी हुई थी। मेरा एक हाथ नीचे साड़ी के अंदर घुस गया। पेटीकोट के अंदर पैंटी थी। मैंने पैंटी के अंदर हाथ डाल दिया। उसकी चूत पहले से गीली थी। उँगलियाँ फिसल रही थीं।
मैंने क्लिट पर उँगली फेरी। दीदी की टाँगें थोड़ी फैल गईं। मैंने दो उँगलियाँ उसकी चूत के अंदर घुसा दीं। गरम और बहुत चिकनी। अंदर की दीवारें मेरी उँगलियों को कस रही थीं। मैंने अंदर-बाहर करना शुरू कर दिया।
दीदी ने दीवार पकड़ ली। “मत कर… गलत हो रहा है यह…” लेकिन साथ ही उसकी गांड मेरे लंड पर दब रही थी।
मैंने साड़ी और पेटीकोट दोनों ऊपर कर दिए। पैंटी नीचे खींच दी। दीदी की गांड और चूत नंगी हो गईं। मैंने जींस का बटन खोला और लंड बाहर निकाला। मोटा और कठोर लंड दीदी की गांड से टकराया। मैंने लंड को उसकी गीली चूत पर रगड़ा। आगे-पीछे। क्लिट पर सेट करके मला।
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दीदी की कराहें तेज हो गईं। “अंदर मत डालना… प्लीज…”
लेकिन मैंने सुना नहीं। लंड का सिरा चूत के छेद पर रखा और धीरे से धक्का दिया। आधा अंदर चला गया। दीदी ने जोर से साँस ली। मैंने और धक्का दिया। पूरा लंड उसकी चूत में समा गया।
“आह्ह्ह… पूरा जा रहा है… दर्द हो रहा है…” दीदी चीखी।
मैं रुका नहीं। दोनों हाथों से उसकी कमर पकड़ी और जोर-जोर से चोदने लगा। हर धक्के के साथ उसकी चुचियाँ हिल रही थीं। मोमबत्ती की रोशनी में पानी की आवाज और हमारी साँसें मिल रही थीं। दीदी की चूत बहुत तंग थी। मेरा लंड अंदर-बाहर हो रहा था और आवाज आ रही थी—चप-चप।
मैंने गति बढ़ा दी। दीदी की कराहें अब मना करने वाली नहीं रह गई थीं। “और जोर से… वहीं… वहीं मार…”
मैंने उसके बाल पकड़कर सिर पीछे किया और और तेज धक्के मारने लगा। दीदी की गांड मेरे पेट से टकरा रही थी। थोड़ी देर बाद मैंने लंड बाहर निकाला और उसे घुमाया। दीदी की पीठ दीवार से लगी थी। मैंने उसकी एक टाँग उठाई और फिर से चूत में लंड घुसा दिया। इस पोजीशन में और गहरा जा रहा था।
दीदी ने मेरे कंधे पकड़ लिए। उसकी चुचियाँ मेरे मुँह के पास थीं। मैंने एक चुची मुँह में ले ली और चूसते हुए चोदता रहा। दीदी का शरीर काँपने लगा। उसकी चूत सिकुड़ने लगी।
“आ रही हूँ… मत रोक… और तेज…” दीदी ने हाँफते हुए कहा।
मैंने पूरी ताकत लगा दी। दीदी की चीख निकल गई। उसकी चूत ने मेरे लंड को इतनी जोर से जकड़ा कि मैं भी लगभग निकलने वाला था। लेकिन मैंने रोक लिया। दीदी का शरीर ढीला पड़ गया। पानी उसकी जाँघों से बह रहा था।
मैंने उसे रसोई के स्लैब पर बैठा दिया। टाँगें फैलाईं और खुद घुटनों के बल बैठ गया। उसकी चूत मेरे मुँह के बिल्कुल सामने थी। मैंने जीभ निकालकर चाटना शुरू कर दिया। क्लिट को चूसा, छेद के अंदर जीभ घुसाई, नीचे से ऊपर तक चाटा। दीदी के हाथ मेरे बालों में थे। वह मेरा सिर अपनी चूत पर दबा रही थी।
“जीभ और अंदर डाल… हाँ… ऐसे ही चाट…” दीदी बड़बड़ा रही थी।
मैंने दो उँगलियाँ अंदर डालकर तेजी से हिलाईं और साथ में क्लिट चूसता रहा। दीदी दोबारा चरम पर पहुँच गई। इस बार और जोर से। उसकी टाँगें मेरे कंधों पर काँप रही थीं। चूत से पानी मेरी जीभ पर आ रहा था। मैंने सब चाट लिया।
फिर मैं खड़ा हुआ। लंड फिर से चूत में डाल दिया। स्लैब पर बैठे-बैठे चोदने लगा। दीदी की पीठ मेज से लगी थी। चुचियाँ हवा में हिल रही थीं। मैंने दोनों चुचियाँ पकड़कर दबाईं और निप्पल मरोड़े। दीदी की आँखें बंद थीं। मुँह से सिर्फ कराहें निकल रही थीं।
मैंने अचानक लंड बाहर निकाला और दीदी को घुमा दिया। अब वह स्लैब पर झुकी हुई थी। गांड मेरे सामने थी। मैंने थूक लगाया और लंड को गांड के छेद पर सेट किया। दीदी ने महसूस किया।
“नहीं… वहाँ मत डाल… बहुत दर्द होगा…”
मैंने धीरे से दबाव दिया। छेद धीरे-धीरे फैल रहा था। आधा लंड अंदर गया तो दीदी ने जोर से चीख मारी। मैं रुक गया। थोड़ी देर बाद फिर धक्का दिया। पूरा लंड उसकी गांड में चला गया।
“आह्ह्ह… निकल… दर्द हो रहा है बहुत…” दीदी की आँखों से आँसू आ गए।
मैंने धीरे-धीरे हिलेना शुरू किया। पहले बहुत धीरे। गांड की दीवारें मेरे लंड को कस रही थीं। थोड़ी देर बाद दर्द कम हुआ और दीदी की कराहें बदल गईं। मैंने गति बढ़ा दी। अब गांड चोद रहा था जोर से। एक हाथ से उसकी चूत में उँगली डाल रखी थी।
दीदी बिल्कुल पागल हो गई थी। “और जोर से चोद गांड… हाँ… फाड़ दे…”
मैंने पूरी ताकत लगा दी। थप-थप की आवाज रसोई में गूँज रही थी। दीदी की चुचियाँ स्लैब से रगड़ रही थीं। मैंने महसूस किया कि मेरा समय पास है। मैंने लंड गांड से निकाला और चूत में डाल दिया। कुछ जोरदार धक्के मारकर अंदर ही छोड़ दिया। गर्म वीर्य की धारें उसकी चूत में भर गईं। दीदी भी साथ में चरम पर पहुँची। दोनों काँपते हुए खड़े रहे।
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थोड़ी देर बाद हम दोनों फर्श पर बैठ गए। बारिश अभी भी जोरों पर थी। बिजली अभी तक नहीं आई थी। मोमबत्ती की रोशनी में दीदी की नंगी चुचियाँ और जाँघों पर लगे वीर्य के निशान दिख रहे थे।
दीदी ने मेरी तरफ देखा। शर्म और मजे दोनों उसकी आँखों में थे। उसने धीरे से कहा, “यह गलत था… लेकिन… रोक नहीं पाई।”
मैंने उसका हाथ पकड़ा और अपनी तरफ खींच लिया। दीदी मेरे गोद में बैठ गई। उसकी चूत मेरे लंड से छू रही थी। लंड फिर से सख्त होने लगा था। दीदी ने महसूस किया और मुस्कुरा दी।
उसने खुद मेरा लंड पकड़ा और अपनी चूत पर रगड़ने लगी। फिर धीरे से अंदर बैठा लिया। अब वह ऊपर थी। कमर घुमा-घुमा कर चोदने लगी। चुचियाँ मेरे मुँह के पास थीं। मैंने दोनों को बारी-बारी से चूसा। दीदी की गति धीरे-धीरे तेज होती गई। उसकी चूत मेरे लंड को निगल रही थी।
मैंने उसकी गांड पकड़कर ऊपर-नीचे करने में मदद की। दीदी की कराहें फिर से शुरू हो गईं। इस बार वह खुद बोली, “आज पूरी रात चोद मुझे… मम्मी-पापा नहीं हैं… जितना मन करे।”
मैंने उसे लिटा दिया। मिशनरी पोजीशन में। टाँगें मेरे कंधों पर रखीं और गहराई तक चोदने लगा। हर धक्का इतना गहरा था कि दीदी की साँस अटक रही थी। मैंने उसके होंठ चूस लिए। जीभ से जीभ मिलाई। नीचे लंड चूत में धँसता रहा।
फिर मैंने उसकी टाँगें और फैलाईं। कोण बदल दिया। अब लंड उसकी चूत की सबसे संवेदनशील जगह पर लग रहा था। दीदी के नाखून मेरी पीठ में गड़ गए। वह बार-बार चरम पर पहुँच रही थी। हर बार उसकी चूत सिकुड़कर मेरे लंड को जकड़ लेती।
मैंने एक बार फिर गांड में डालने का मन किया। लंड निकाला, थूक लगाया और इस बार ज्यादा आसानी से गांड में घुस गया। दीदी ने तकिया मुँह में दबा लिया। मैंने जोर-जोर से गांड चोदी। एक हाथ से उसकी चूत सहला रहा था। दीदी की आवाज तकिए में दब रही थी लेकिन शरीर बता रहा था कि मजा आ रहा है।
मैंने गांड में ही छोड़ दिया। वीर्य अंदर भर गया। निकाला तो वह बाहर निकलने लगा। दीदी लेटी हुई हाँफ रही थी। मैं उसके बगल में लेट गया। दोनों पसीने से भीगे हुए थे। बारिश की आवाज अभी भी आ रही थी।
कुछ देर चुप रहने के बाद दीदी ने मेरा लंड हाथ में ले लिया। वह फिर से सख्त हो रहा था। दीदी मुस्कुराई और नीचे सरक गई। उसने लंड मुँह में ले लिया। पहले सिरा चूसा, फिर पूरा अंदर ले गई। गला गहरा। मैंने उसके बाल पकड़ लिए। दीदी मेरा लंड ऐसे चूस रही थी जैसे सालों से तरस रही हो। लार टपक रही थी। कभी-कभी दाँत हल्के से लग जाते तो मजा और बढ़ जाता।
मैंने कहा, “अब चूत में डाल।”
दीदी ऊपर आई और फिर से सवार हो गई। इस बार वह खुद तेज-तेज कमर हिला रही थी। चुचियाँ मेरे चेहरे पर गिर रही थीं। मैंने उन्हें मुँह में ले रखा था। दीदी की चूत इतनी गीली थी कि आवाज जोर से आ रही थी।
हम दोनों फिर से चरम पर पहुँचे। इस बार मैंने बाहर निकालकर उसकी चुचियों पर छोड़ा। वीर्य उसकी चुचियों और गर्दन पर फैल गया। दीदी ने उँगली से वीर्य लिया और मुँह में डाल लिया।
बारिश थमने का नाम नहीं ले रही थी। बिजली भी नहीं आई। हम दोनों कमरे में चले गए। बिस्तर पर लेटे। दीदी ने खुद अपना पैर फैलाया और कहा, “अब धीरे से चोद… रात भर।”
मैंने उसके ऊपर चढ़ाई की। लंड चूत में डाला और इस बार बहुत धीरे-धीरे हिलाने लगा। लंबी स्ट्रोक। पूरा बाहर निकालता, फिर धीरे से अंदर तक ले जाता। दीदी की आँखें मुझसे मिल रही थीं। शर्म अब पूरी तरह जाती रही थी। वह खुद अपनी चुचियाँ दबा-दबा कर मुझे दिखा रही थी।
मैंने उसकी टाँगें मोड़ दीं। घुटने उसके सीने से लग गए। इस पोजीशन में लंड बहुत गहरा जा रहा था। दीदी की चीखें निकलने लगीं। मैंने मुँह उसके होंठों पर रख दिया ताकि आवाज कम निकले। नीचे लंड बदस्तूर चलता रहा।
फिर मैंने उसे साइड में लिटाया। एक टाँग अपनी कमर पर चढ़ाई और पीछे से चूत में डाला। एक हाथ उसकी चुची पर था, दूसरा क्लिट पर। इस अंदाज में हम लंबे समय तक जुड़े रहे। दीदी बार-बार पानी छोड़ रही थी। मेरा लंड उसकी चूत की गर्मी में गलता जा रहा था।
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रात के लगभग दो बज गए होंगे जब हम थके। लेकिन आराम सिर्फ आधा घंटा ही किया। दीदी ने फिर से मेरा लंड पकड़ा और कहा, “एक बार और… गांड में डाल इस बार।”
मैंने उसे कुत्तिया बना दिया। घुटनों के बल। पहले चूत में कुछ धक्के मारे फिर लंड निकालकर गांड में डाल दिया। इस बार दीदी खुद पीछे की तरफ धक्का दे रही थी। मैंने उसकी कमर पकड़कर जोर से चोदा। थप-थप की आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी। दीदी की चुचियाँ बिस्तर से रगड़ रही थीं।
मैंने अंतिम बार गांड में ही छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे से चिपके हुए गिर पड़े। शरीर में जान नहीं बची थी। लेकिन संतुष्टि ऐसी थी कि आँखें बंद करते ही नींद आ गई।
सुबह जब आँख खुली तो बारिश रुक चुकी थी। दीदी मेरे बाजू में नंगी लेटी थी। उसकी जाँघों पर सूखा वीर्य चिपका हुआ था। चुचियों पर मेरे दाँतों के निशान थे। मैंने धीरे से उसकी चूत पर हाथ रखा तो वह जाग गई।
दीदी ने आँखें खोलीं और मुस्कुरा दी। बोली, “पागल… फिर से शुरू करेगा क्या?”
मैंने जवाब में उसका हाथ अपने लंड पर रख दिया। वह फिर से सख्त हो चुका था। दीदी हँसी और खुद ऊपर चढ़ गई। सुबह की रोशनी में उसकी नंगी बॉडी चमक रही थी। उसने लंड अपनी चूत में लिया और धीरे-धीरे हिलने लगी।
हमने फिर से चुदाई शुरू कर दी। सुबह का समय था। जल्दीबाजी नहीं थी। दीदी की चूत रात भर की चुदाई से थोड़ी सूजी हुई थी लेकिन फिर भी गरम और गीली थी। मैंने उसकी चुचियाँ मुँह में लीं और चूसते हुए नीचे से धक्के मारता रहा।
उस सुबह हमने दो बार और किया। एक बार चूत में, एक बार गांड में। आखिरी बार जब मैंने उसकी चूत में छोड़ा तो दीदी ने मुझे कसकर जकड़ लिया। बोली, “अब यह हमारा राज़ रहेगा… कभी किसी को नहीं बताना।”
मैंने सिर हिलाया। लेकिन अंदर से जानता था कि जब भी मौका मिलेगा, मैं फिर से दीदी की चूत और गांड माँगूँगा। और दीदी दे देगी। क्योंकि उस बरसात वाली रात ने दोनों की हवेस जगा दी थी।
दोपहर तक मम्मी-पापा के आने का समय था। हम दोनों नहाए। दीदी ने साड़ी पहनी। लेकिन जब वह तैयार होकर निकली तो उसकी चलने में थोड़ी तकलीफ हो रही थी। गांड और चूत दोनों अभी भी संवेदनशील थीं। मैंने देखा और मुस्कुरा दिया। दीदी ने भी मेरी तरफ देखकर आँख मार दी।
उस दिन के बाद से घर में जब भी हम अकेले होते हैं, दीदी की नजर मेरे लंड पर चली जाती है। और मेरी नजर उसकी चुचियों और गांड पर। बरसात अब सिर्फ मौसम नहीं रह गई हमारे लिए। वह बहाना बन गई है… दीदी की चूत पाने का।
और हर बार जब बारिश होती है, दीदी खुद मेरे कमरे में आ जाती है। दरवाजा बंद करती है। साड़ी की पल्लू गिराती है। और कहती है, “आज फिर से चोद… जोर से… जैसी उस दिन चोदी थी।”
फिर वही सिलसिला शुरू हो जाता है। चुचियाँ चूसना, चूत चाटना, लंड मुँह में लेना, चूत और गांड दोनों फाड़ना। वीर्य से भरना। और रात भर करना।
दीदी अब खुद बोलती है, “तेरा लंड मेरी चूत का आदी हो गया है… और मेरी चूत तेरे लंड की।”
मैं बस मुस्कुराता हूँ और अपना लंड उसकी गीली चूत में उतार देता हूँ। बरसात हो या न हो… अब हमें बहाने की जरूरत नहीं रह गई।
लेकिन उस पहली बरसात वाली रात को हम कभी नहीं भूल सकते। जब दीदी ने पहली बार अपनी चूत मुझे दी थी। जब पहली बार उसकी गांड मेरे लंड से भरी थी। जब पहली बार उसकी चुचियाँ मेरे मुँह में थीं और वह खुद कह रही थी—“और जोर से चोद दीदी को।”
वह रात हमारी जिंदगी की सबसे गरम रात थी। और आने वाले दिनों में और भी कई रातें आने वाली हैं… जब दीदी फिर से अपनी चूत खोलेगी और कहेगी—“ले, आज फिर से तेरी है।”
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