Wife ko dosto se chudwaya:- सोहम के उस अजीब और शॉकिंग ‘ओपन रिलेशनशिप’ वाले प्रपोज़ल के बाद, पिछले कुछ दिनों से गीति अपने ही ख्यालों की उलझन में खोई रहती थी।
(yeh ek hindi sex story hai — ek bold kamuk kahani) Pichla part yaha padhen ==> संस्कारी वाइफ से रंडी बनने तक का सफर 1
Wife ko dosto se chudwaya desi chudai kahani
एक अजीब सी कशमकश थी उसके अंदर — गुस्सा, ठुकराव का दर्द, और एक अनजानी सी आग। पर औरत का दिमाग़ जब किसी चीज़ से बग़ावत करने पर आता है, तो सबसे पहले उसके पहनावे में झलकता है।
एक दिन, आईने के सामने खड़े होकर गीति ने डिसाइड किया कि आज वो अपनी साधारण सी इमेज तोड़ देगी। उसने वॉर्डरोब से एक बेहद बोल्ड साड़ी निकाली — डीप नेवी ब्लू जिसमें एक चमकता हुआ सिल्वर बॉर्डर था।
साड़ी का कपड़ा इतना नरम और पतला था कि वो उसके कर्व्स से किसी दूसरी स्किन की तरह लिपट गया। उसका ब्लाउज़ बैकलेस नहीं था, पर आगे से उसका डीप कट उसकी मिल्की व्हाइट क्लीवेज को एक टेम्प्टिंग झलक दे रहा था।
आज उसकी आँखों में एक अजीब सा कॉन्फ़िडेंस और ग्लोइंग नशा था। जैसे ही उसने बैंक में, अपने केबिन की तरफ़ स्टेप लिया, वहाँ की हवा ही बदल गई। हर नज़र, चाहे मर्द की हो या औरत की, उस पर आकर टिक गई।
नेवी ब्लू साड़ी में उसकी गोरी रंगत और भी ज़्यादा खिल रही थी, और उसकी कमर का लचकना आज कुछ ज़्यादा ही नुमायाँ था।
एक सीनियर कलीग से रहा नहीं गया और वो बोल पड़ा — “गीति, आज तो तुमने धमाका कर दिया! बैंक का माहौल ही रंगीन कर दिया तुमने।”
गीति ने पल्लू को हल्के से अपनी उँगली पर लपेटते हुए एक कॉन्फ़िडेंट स्माइल दिया। “क्या करूँ, मूड ही ऐसा था आज।”
उस दिन पूरी ऑफ़िस में उसके चलते ही जैसे करंट सा दौड़ जाता था। एक नए इंटर्न ने तो, जो गीति से उम्र में काफ़ी छोटा था, उसकी डेस्क पर आकर सीधा कह दिया — “मैम… अगर मुझे HR का डर न होता, तो मैं सच में आज आपको कॉफ़ी डेट पे ले जाता।”
गीति को गुस्सा आना चाहिए था, पर उसके अंदर की उस नई औरत ने टीज़िंग टोन में जवाब दिया — “अच्छा है तुम HR से डरते हो… वरना पता नहीं क्या-क्या कर बैठते।” इंटर्न शर्मा कर चला गया, पर गीति के पेट में एक मीठी सी गुदगुदी छोड़ गया।
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शाम का वक़्त था। बैंक का काम थोड़ा हल्का हो चुका था। गीति एक क्लाइंट से फ़ोन पे बात करने के लिए ऑफ़िस की छत की तरफ़ चली गई। टेरेस का दरवाज़ा थोड़ा खुला था।
जैसे ही वो बाहर क़दम रखने वाली थी, उसने बैकग्राउंड में सिगरेट पीते हुए कुछ मर्दों की आवाज़ें सुनीं। वो उसके ही डिपार्टमेंट के तीन मेल कलीग्स थे। गीति वहीं दरवाज़े के पीछे रुक गई।
“भाई, आज गीति मैम को देखा? उसकी साड़ी ने तो आग लगा दी आज… वो हिप्स का कर्व… उफ़्फ़,” एक मर्द की हवस भरी आवाज़ आई।
“सही कह रहा है। उसका फ़िगर तो इस साड़ी में और ज़्यादा टेम्प्टिंग लग रहा था। मैं तो कहता हूँ, एक बार मिल जाए तो पूरा दिन सिर्फ़ उसे ही देखता रहूँ,” दूसरे ने एक गंदी हँसी हँसते हुए कहा।
“अबे, देखने में जितनी सॉफ़्ट और संस्कारी लगती है ना, मुझे लगता है वो ईज़िली कंट्रोल हो जाती है… सेक्सी भी है और सॉफ़्ट भी। एक चांस मिल जाए बस,” तीसरा बोला, जैसे कोई गंदा सपना देख रहा हो।
“भाई तू एक की बात कर रहा है? जिस तरह की उसकी चाल थी आज, लिख के ले ले, वो दो लोगों को भी एक साथ संभाल सकती है। एक काम करते हैं, कोई प्राइवेट पार्टी प्लान करो, और उसे इनवाइट करो। पिला कर देखते हैं इसका असली रूप,” पहले वाले ने फिर से कहा।
गीति की आँखों में एक सेकंड के लिए भयानक शॉक था। उसके पाँव ज़मीन पर जम गए। वो सारी तारीफ़ें नहीं थीं, वो उसे किसी इंसान की तरह नहीं, बल्कि एक गोश्त के टुकड़े की तरह देख रहे थे।
जैसे उसका पूरा नंगा बदन उनके लिए कोई फ़ैंटेसी हो, जिसे वो अपने बिस्तर पर नोचने की बातें कर रहे थे। एक इज़्ज़तदार ब्रांच मैनेजर को अंदर जाकर उन्हें थप्पड़ मारना चाहिए था। पर उसने अपना संयम बनाये रखा।
क्यों? क्योंकि गुस्से की जगह… उसके जिस्म में एक अजीब सा, रॉ और फ़ॉरबिडन करंट दौड़ गया था। ‘दो लोगों को संभाल सकती है… ईज़िली कंट्रोल हो जाती है…’ ये गंदे शब्द उसके कानों से होते हुए सीधा उसकी जाँघों के बीच आग लगा रहे थे।
वो वहाँ से बिना कोई आवाज़ किये, स्लोली वॉक करते हुए ऑफ़िस के बाथरूम की तरफ़ मुड़ गई। बाथरूम तक का वो छोटा सा रास्ता उसे मीलों लंबा लग रहा था। उसकी साँसें भारी हो चुकी थीं और दोनों टाँगों के बीच उसे एक चिपचिपा गीलापन महसूस होने लगा था।
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बाथरूम में आते ही उसने जल्दी से डोर लॉक किया। वो आईने के सामने आकर खड़ी हो गई और हाँफते हुए खुद को देखा।
साड़ी की परफ़ेक्ट फ़िटिंग, उसकी कमर का वो थोड़ा सा उभार, नेवी ब्लू ब्लाउज़ से बाहर झाँकते हुए उसके गोरे कर्व्स — सब कुछ उसे अब खुद पे एक अजीब सा असर कर रहा था। वो खुद को अब अपनी नज़रों से नहीं, बल्कि उन तीन मर्दों की गंदी नज़रों से देख रही थी।
उसने अपने हाथ से गाल पर आए बालों को थोड़ा साइड किया, और फिर धीरे से, काँपते हाथों से अपने ब्लाउज़ की नेकलाइन को हल्का सा और नीचे एडजस्ट किया।
वो टेरेस वाली बातें उसके दिमाग़ में किसी पॉर्न मूवी के डायलॉग की तरह गूँज रही थीं — ‘दो बंदे भी संभाल सकती है’, ‘मैं तो रख ही लेता उसे अपने पास’। उसने आँखें बंद कीं और एक ठंडी साँस ली।
उसका शरीर बुरी तरह गरम होने लगा था। वो जानती थी कि ये गुस्सा नहीं था, ये उसकी सालों की दबी हुई भूख थी। ये कुछ और था… कुछ रॉ, कुछ बेहद फ़ॉरबिडन।
गीति ने वेस्टर्न टॉयलेट का सीट कवर डाउन किया और स्लोली उसपे बैठ गई। उसकी साँस तेज़ थी, और उसकी छाती तेज़ी से ऊपर-नीचे हो रही थी।
उसने अपना सिल्वर पल्लू थोड़ा साइड किया, और अपने नेवी ब्लू ब्लाउज़ का सबसे नीचे वाला बटन हल्का सा खोल दिया, जिससे उसका गोरा पेट साफ़ नज़र आने लगा।
अपने थरथराते हुए हाथों को धीरे-धीरे अपनी थाइज़ पे मूव करते हुए, उसने अपनी साड़ी को घुटनों से ऊपर तक खिसका लिया। ऑफ़िस के ठंडे बाथरूम में उसकी गोरी, नंगी जाँघें किसी ज्वालामुखी की तरह तप रही थीं।
उसने अपना एक हाथ साड़ी के अंदर स्लिप किया… और अपनी सिल्क पैंटीज़ के ऊपर से अपने सबसे सेंसिटिव हिस्से को हल्के से टच किया।
‘शिट…’ उसने हल्की सी, हाँफती हुई विस्पर की। उसकी पैंटी का फ़ैब्रिक पूरी तरह से भीग चुका था। वो ऑलरेडी इतनी वेट थी कि उसे अपने ही जिस्म की गर्मी और रस का एहसास पैंटी के बाहर तक हो रहा था।
उसके फ़िंगरटिप्स ने पैंटी के इलास्टिक को थोड़ा साइड में खिसका दिया, और उसकी नंगी उँगलियाँ सीधे उसके वेट, सूजे हुए फ़ोल्ड्स तक पहुँच गईं। जैसे ही उसने अपनी गीली चूत को छुआ, उसके मुँह से एक सिसकारी निकल गई।
उसने अपने क्लिट पर हल्की सी सर्कुलर मोशन शुरू की… और तभी दिमाग़ में उन आवारा शब्दों ने फिर दस्तक दी — ‘उसकी बूब्स का साइज़ देखा? परफ़ेक्ट है… एक चांस मिल जाए बस।’
ये सोचकर कि बाहर बैठकर मर्द उसके नंगे जिस्म के बारे में क्या-क्या गंदी बातें सोच रहे हैं, उसके अंदर एक नया, वाइल्ड थ्रिल जाग उठा।
उसकी साँसें और तेज़ हो गईं। उसकी दो उँगलियाँ अब उसकी गीली दरार के अंदर-बाहर होने लगीं। ‘चपक-चपक’ की गीली आवाज़ बाथरूम की ठंडी दीवारों से टकरा रही थी।
‘म्म्ह…’ एक सॉफ़्ट, बेकाबू मोन उसके होठों से निकल गया। जैसे ही उसे आवाज़ का एहसास हुआ, उसने तुरंत अपना दूसरा हाथ अपने होठों पे रखकर उसे दबा लिया।
‘अगर किसी ने सुन लिया तो? अगर कोई वॉशरूम में आ गया तो?’ ये डर… पकड़े जाने का ये डर उसके नंगे जिस्म को और भी ज़्यादा पागल कर रहा था।
उसके बॉडी ने एक अजीब सा चिल लेना शुरू किया, हर सर्कुलर मोशन, हर फ़िंगर स्ट्रोक के साथ उसका लोअर बॉडी और भी टाइट हो रहा था। उसने आँखें कसकर बंद कीं और अपनी फ़ैंटेसी को पूरी तरह आज़ाद कर दिया।
उसने इमेजिन किया — कि वो टेरेस वाली पार्टी सच हो गई है। वो तीन पुरुष उसके आसपास खड़े हैं। एक ने उसके हाथ पकड़े हुए हैं, दूसरा उसके इस परफ़ेक्ट नेवी ब्लू ब्लाउज़ के बटन बेरहमी से खोल रहा है, साड़ी को नोचकर निकाल रहा है…
और वो तीनों अनजान, हवस से भरे मर्द उसके नंगे कर्व्स पर, उसके हिप्स पर अपने मोटे, सख़्त हाथ फेर रहे हैं। उसे ‘कंट्रोल’ कर रहे हैं।
‘म्म्ह… फ़क…’ वो अपने ही इन गंदे शब्दों और मोन से थोड़ा शर्मा गई, लेकिन उसका हाथ नहीं रोका। उसने कभी गाली नहीं दी थी, पर आज लस्ट के इस नशे में ये शब्द उसके होठों से खुद-ब-खुद फिसल गया था।
एक इंटेंस, गरम वेव उसके अंदर से उठ रही थी। हर टच के साथ उसका लोअर बॉडी और भी टाइट, और भी भूखा हो रहा था।
तभी, उस जुनून के बीच, एक सेकंड के लिए उसने सोहम का ध्यान किया… सोहम जो उसे नहीं छूता था, सोहम जो उसे किसी और मर्द के बिस्तर पर भेजना चाहता था।
और फिर अचानक, उसके दिमाग़ में अमृता का चेहरा फ़्लैश हुआ! उसका अपना पति और उसकी छोटी बहन। ये ख्याल इतना डिस्टर्बिंग था, इतना चुभने वाला था, कि उसने गीति के दिमाग़ की सारी नसें झनझना दीं। एक झटका सा लगा उसके पूरे जिस्म को।
सोहम का रिजेक्शन और उन पराये मर्दों की वाइल्ड हवस — इन दोनों के डेडली कॉम्बिनेशन ने उसके जिस्म का फ़्यूज़ उड़ा दिया। और एकदम — वो क्लाइमैक्स की एज पे आ गई।
उसने अपनी उँगलियों को पूरी ताक़त से अपने क्लिट पर दबाया। आँखें टाइटली बंद करके, अपने दूसरे हाथ को अपने मुँह पर और कसकर दबाते हुए, एक मफ़ल्ड क्राई के साथ उसने एक बेहद शक्तिशाली, काँपने वाला ऑर्गेज़्म फ़ील किया।
उसका पूरा जिस्म, उसकी गोरी थाइज़, बुरी तरह शेक कर रही थीं। उसका गरम रस उसकी उँगलियों को भिगोता हुआ टॉयलेट सीट पर गिरने लगा था।
उसका हाथ अब रुक गया था। उसकी साँसें बहुत छोटी और उखड़ी हुई थीं, और लेग्स स्लाइटली शेकिंग।
कुछ सेकंड्स बाद, जब उस तूफ़ान का असर थोड़ा कम हुआ, तो रियलिटी ने उसे घेर लिया। एक बहुत भयानक और हैवी गिल्ट उसके दिल पर बैठ गया।
‘मैंने ये क्या किया? अपने ऑफ़िस के बाथरूम में? उन घटिया मर्दों की बातें सोचकर?’ उसने जल्दी से टिश्यू पेपर निकाला, अपने आप को साफ़ किया और कपड़े ठीक किये।
जब वो खड़ी हुई, तो उसके पैर अभी भी थोड़े काँप रहे थे। उसने सिंक के पास आकर ठंडा पानी अपने चेहरे पर मारा।
जब उसने टॉवल से चेहरा पोंछकर दोबारा मिरर में देखा, तो वो हैरान रह गई। उसका फ़ेस लस्ट की गर्मी से लाल था, आँखें हैवी और नशीली लग रही थीं…
और उसके होठों पे शर्म या गुस्से की जगह एक लाइट, नॉटी स्माइल थी। एक ऐसी औरत की स्माइल जिसने अभी-अभी अपनी दबी हुई डार्क साइड को पहचाना था। गिल्ट था, पर उस गिल्टी एन्जॉयमेंट ने उसकी रूह में घर कर लिया था।
‘वॉव, गीति… तुम वैसी नहीं हो जो तुम दिखती हो,’ उसने आईने में अपने रिफ़्लेक्शन को घूरते हुए, एक सॉफ़्ट और मिस्टीरियस वॉइस में खुद से कहा।
वो खड़ी हुई, अपने ब्लाउज़ को वापस परफ़ेक्ट फ़िटिंग में लाई, पल्लू ठीक किया, अपने पर्स से थोड़ा महँगा परफ़्यूम निकालकर स्प्रे किया… और एक और भी ज़्यादा कॉन्फ़िडेंट, पर ख़तरनाक एक्सप्रेशन के साथ बाथरूम से बाहर निकल गई।
जब गीति बैंक के ठंडे बाथरूम में अपनी दबी हुई आग और नए रूप से रूबरू हो रही थी, ठीक उसी वक़्त घर पर एक बिल्कुल अलग ही तूफ़ान ने दस्तक दे दी थी।
घर पर उसी वक़्त सोहम और अमृता अकेले थे। बाहर की धूप खिड़कियों से छनकर लिविंग रूम में आ रही थी, पर घर के अंदर की हवा में एक अजीब सा टेंशन, एक अनस्पोकन खिंचाव था।
सोहम सोफ़ा पर लैपटॉप खोले बैठा था, पर उसका दिमाग़ अपने काम में नहीं लग रहा था। गीति से दूरी ने उसे अंदर से बिल्कुल खोखला कर दिया था।
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तभी अमृता नहाकर अपने कमरे से बाहर आई। उसने एक बहुत ही लाइट कॉटन ड्रेस पहनी हुई थी, जो उसकी फ़्रेश और यूथफ़ुल बॉडी पर थोड़ा क्लिंगी था।
कपड़ा इतना पतला था कि उसके अंडरगारमेंट्स की आउटलाइंस हल्के से गेस की जा सकती थीं। उसके फ़्रेशली वॉश्ड बाल, जिनसे अभी भी मीठी शैंपू की खुशबू आ रही थी, उसके शोल्डर्स पे आज़ादी से गिर रहे थे।
एक-आध पानी की बूँद उसकी नेक से होते हुए उसके कॉलरबोन की तरफ़ लुढ़क रही थी। सोहम ने जैसे ही स्क्रीन से नज़र हटाकर उसे देखा, वो एक मोमेंट के लिए पूरी तरह फ़्रीज़ हो गया।
वो जवान, ताज़ा और बेबाक लड़की उसकी आँखों के सामने किसी अप्सरा की तरह खड़ी थी। गीति की बेरुखी और सीरियस नेचर के ठीक उलट, अमृता में एक ऐसी रॉ और कच्ची कशिश थी जो सोहम के मर्दाना दिमाग़ को हावी कर रही थी।
‘तुम… बिल्कुल ड्रीमी लग रही हो, अमृता,’ सोहम के मुँह से अचानक ये शब्द निकल गए। आवाज़ में एक अजीब सा भारीपन था।
अमृता रुक गई। उसकी आँखें थोड़ी बड़ी हुईं, और उसने अपने होठों को हल्के से दाँतों तले दबा लिया। वो थोड़ा ब्लश करते हुए, अपनी नज़रें थोड़ी नीची करके बोली — ‘जीजू, आपको भी मेरी तारीफ़ करने की आदत लग गई है ना आजकल?’
‘तुम्हारे जैसी खूबसूरत लड़की हो सामने, तो तारीफ़ तो बनती है,’ सोहम ने लैपटॉप को कॉफ़ी टेबल पर धकेल दिया और धीरे से खड़ा हो गया। वो बिना सोचे, जैसे किसी नशे में हो, उसके थोड़ा क़रीब आ गया।
कमरे की ख़ामोशी अब दोनों की धड़कनों को सुनने लगी थी। अमृता ने उसकी आँखों में वो भूख देख ली थी। वो एक क़दम पीछे हटी, पर उसके चेहरे पर डर नहीं, एक फ़्लर्ट भरा डर था।
‘आप मुझे टीज़ कर रहे हो ना, जीजू?’ उसने पूछा, उसकी साँसें थोड़ी तेज़ होने लगी थीं। सोहम उसके ठीक सामने आकर खड़ा हो गया। दोनों के बीच अब सिर्फ़ कुछ इंच का फ़ासला था।
सोहम ने उसकी निगाहों में गहराई से देखते हुए, एक धीमी, काँपती हुई टोन में कहा — ‘नहीं… बस वो कह रहा हूँ जो इस वक़्त दिल कह रहा है।’
अमृता ने हिम्मत करके अपनी आँखों को उसकी आँखों में डाला। और उस मोमेंट में, जैसे एक सालों पुरानी काँच की दीवार टूटकर बिखर गई हो। उनके बीच की सारी ‘जीजा-साली’ की बाउंडरीज़ और इज़्ज़त के दायरे अचानक मेल्ट होने लगे।
सोहम ने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और अमृता का नरम, गोरा हाथ पकड़ लिया। अमृता का जिस्म उस पहले असल स्पर्श से झनझना उठा। सोहम का अँगूठा उसकी कलाई पर हल्के से सहलाने लगा।
कुछ सेकंड्स तक दोनों बस एक-दूसरे को घूरते रहे, जैसे उस पल की ग्रैविटी को समझने की कोशिश कर रहे हों। पर हवस और आकर्षण का असर दिमाग़ को सोचने का वक़्त कहाँ देता है।
सोहम की उँगलियाँ धीरे-धीरे अमृता के हाथ से होते हुए ऊपर आईं, उसकी नेक को हल्के से छुआ, और फिर उसके उस क्लिंगी कॉटन ड्रेस के सबसे ऊपर वाले बटन पर जाकर ठहर गईं।
अमृता की साँस पूरी तरह तेज़ हो गई थी। उसकी छाती ज़ोर-ज़ोर से ऊपर-नीचे हो रही थी। उसने काँपती आवाज़ में, बहुत ही सॉफ़्टली कहा — ‘जीजू… प्लीज़…’
पर ये ‘प्लीज़’ किसी चीज़ को रोकने के लिए नहीं था। उसकी आवाज़ में न तो गुस्सा था, न ही कोई मना करने का इशारा। बल्कि वो एक सरेंडर था, एक डार्क ख़्वाहिश की शुरुआत थी।
सोहम की उँगलियों ने बिना कोई जल्दबाज़ी किये, एक हल्की सी ट्विस्ट के साथ वो पहला बटन खोल दिया। उसके बाद दूसरा।
कॉटन ड्रेस के थोड़ा सा खुलते ही, उसके अंदर से एक बहुत ही डेलिकेट, लाइट पिंक लेस वाली ब्रा दिखाई देने लगी। उसकी जवान, गोरी स्किन उस रोशनी में चमक रही थी।
सोहम ने एक भारी घूँट निगला। उसने गीति के अलावा सालों से किसी औरत को इस तरह क़रीब से नहीं देखा था। उसने अपनी निगाहें अमृता की आँखों में ही रखीं, पर अपना हाथ धीरे से आगे बढ़ाकर उसकी खुली हुई नेकलाइन के बीच, उसके अपर चेस्ट को हल्के से, बेहद जेंटली छुआ।
उस मर्दाना, गरम स्पर्श के पड़ते ही अमृता के मुँह से एक बेकाबू, हल्की सी मोन निकल गई — ‘मम्म…’
वो आवाज़ बेहद सॉफ़्ट और सेंसुअल थी। अमृता की आँखें बंद हो गईं और उसने अपना सिर हल्के से पीछे की तरफ़ झुका दिया।
उनका ये कनेक्शन अब सिर्फ़ फ़िज़िकल नहीं रहा था — वो पल एक बहुत बड़ा इमोशनल क्रैक भी था जो उन्हें एक ऐसी फ़ॉरबिडन दुनिया में खींच रहा था जहाँ रिश्तों की कोई मर्यादा बची ही नहीं थी।
सोहम का हाथ थोड़ा और नीचे गया, उसकी पिंक लेस ब्रा की एज को चूमते हुए…
क्लिक। क्लैक।
मेन डोर के लॉक में चाबी घूमने की आवाज़ आई। ये आवाज़ किसी भारी पत्थर की तरह उस ख़ामोश कमरे में आकर गिरी।
अमृता की आँखें डर और पैनिक से पूरी तरह फट गईं। ‘दीदी!’ उसके होठों से एक काँपती हुई फ़रियाद निकली।
बिना एक सेकंड ज़ाया किये, उसने अपनी पूरी ताक़त से सोहम के सीने पर हाथ रखकर उसे झटके से पीछे धकेल दिया। सोहम दो क़दम पीछे लड़खड़ाया।
अमृता के हाथ बुरी तरह काँप रहे थे जब उसने बेतहाशा जल्दबाज़ी में अपनी ड्रेस के वो दोनों बटन्स वापस लगाए। उसकी साँसें फूली हुई थीं और चेहरा शर्म और डर से लाल हो चुका था।
वो तुरंत कॉफ़ी टेबल की तरफ़ झुकी, अपना मग उठाया और तेज़ी से किचन की तरफ़ भाग गई, जैसे वो वहाँ थी ही नहीं।
सोहम ने एक गहरी साँस ली, अपने शर्ट का कॉलर ठीक किया और जल्दी से सोफ़ा पर बैठकर लैपटॉप स्क्रीन को घूरने लगा। उसकी धड़कनें भी तेज़ थीं।
दरवाज़ा खुला और गीति अंदर आई। वो आज किसी आम दिन की तरह थकी-हारी नहीं लग रही थी। उसकी नेवी ब्लू साड़ी, उसका थोड़ा सा डीप नेक ब्लाउज़, और उसके चेहरे पर आई वो नई ‘नॉटी’ चमक — सब कुछ बदला हुआ था।
आज वो खुद को डिज़ायरेबल महसूस कर रही थी। कमरे की हवा में एक अजीब सा भारीपन था। एक ऐसी महक थी जो पहले कभी इस ड्रॉइंग रूम में नहीं आई — सोहम का मर्दाना कोलोन, अमृता के मीठे शैंपू की खुशबू, और उस अधूरी हवस का एक रॉ, पसीने से भरा सेंट।
गीति ने हल्के से नाक सिकोड़ी, पर उसका दिमाग़ अपने ही नए कॉन्फ़िडेंस और थ्रिल में इतना उलझा हुआ था कि उसने इस टैबू महक पर ध्यान नहीं दिया। उसे लगा शायद खिड़कियाँ बंद होने की वजह से ऐसी स्मेल आ रही है।
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गीति ने अपना पर्स टेबल पर रखा और अपने पल्लू को जान-बूझकर थोड़ा और ढीला छोड़ दिया। वो सोहम को जेलस करना चाहती थी। वो देखना चाहती थी कि क्या उसके पति के अंदर उसके लिए कोई आग, कोई पज़ेसिवनेस बची भी है या नहीं।
‘पता है सोहम,’ गीति ने सोफ़ा के पीछे आकर खड़े होते हुए कहा, उसकी आवाज़ में एक हल्का सा गुरूर था। ‘आज बैंक में माहौल ही कुछ और था। ये साड़ी पहनकर गई थी मैं…’
सोहम ने लैपटॉप से नज़र हटाई और मुड़कर उसे देखा। एक पल के लिए उसकी निगाहें गीति की डीप क्लीवेज और उसके परफ़ेक्ट कर्व्स पर ठहर गईं। ‘अच्छा? क्या हुआ?’ सोहम ने पूछा।
‘सब लोग मुझे ऐसे घूर रहे थे जैसे मैंने कोई फ़ैशन शो में एंट्री ली हो,’ गीति ने हल्के से हँसते हुए कहा, पर उसकी आँखें सोहम का रिएक्शन पढ़ रही थीं।
‘मेरा एक इंटर्न तो सीधा मेरे केबिन में आ गया और कहता है कि अगर उसे HR का डर न होता, तो वो मुझे वहीं सबके सामने कॉफ़ी डेट पर ले जाता। और सच कहूँ, मर्दों की नज़रें बता देती हैं कि उनके दिमाग़ में क्या चल रहा है। वो सच में मुझे आँखों से खा रहे थे।’
गीति को उम्मीद थी कि ये सुनकर सोहम का खून खौल उठेगा। कोई मर्द अपनी इज़्ज़तदार पत्नी के बारे में ऐसे गंदे शब्द सुनकर शांत नहीं रह सकता।
वो चाहती थी कि सोहम गुस्से में उठे, उसे अपनी तरफ़ खींचे, और कहे — ‘तुम सिर्फ़ मेरी हो गीति, किसी और की हिम्मत कैसे हुई तुम्हें ऐसे देखने की।’ पर जो हुआ, उसने गीति की आत्मा को झंझोर कर रख दिया।
सोहम गुस्से से लाल नहीं हुआ। बल्कि, उसका चेहरा अचानक और भी ज़्यादा ध्यान से गीति को देखने लगा। उसकी आँखें थोड़ी बड़ी हो गईं और उसकी साँसें थोड़ी भारी हो गईं। एक अजीब सी, एक्साइट होने वाली मुस्कुराहट उसके होठों पर आ गई।
‘सच में?’ सोहम ने अपनी चेयर थोड़ी और पीछे की, गीति को ऊपर से नीचे तक स्कैन करते हुए पूछा। ‘और… और कैसा लग रहा था तुम्हें? जब वो नए लड़के… जब वो इंटर्न तुम्हें ऐसे घूर रहा था? क्या कहा उसने एग्ज़ैक्ट वर्ड्स में?’
गीति को लगा जैसे किसी ने उसके नए कॉन्फ़िडेंट रूप पर बर्फ़ का ठंडा पानी डाल दिया हो। उसकी स्माइल वहीं फ़्रीज़ हो गई।
‘और बाकी मर्द, गीति? जब तुम बैंक में चलती थी तो क्या वो तुम्हारी कमर देखते थे?’ सोहम की आवाज़ अब खराशदार हो चुकी थी।
वो जेलस नहीं था — वो अपनी पत्नी को दूसरे मर्दों की नज़रों का शिकार होते हुए इमेजिन करके टर्न-ऑन हो रहा था। उसके अंदर का ककॉल्ड फ़ैंटेसी जाग उठा था। ‘उन्हें लगता होगा कि तुम कितनी परफ़ेक्ट हो… है ना? कोई तुम्हें छूना चाहता होगा आज?’
‘सोहम…’ गीति के होठों से ये शब्द काँपते हुए निकले। उसकी आँखों में इकट्ठा हुआ सारा गुरूर, सारा थ्रिल एक झटके में बह गया।
‘तुम्हें कैसा फ़ील हो रहा था, गीति? जब उनकी गंदी नज़रें तुम्हारे जिस्म पर पड़ रही थीं?’ सोहम और क़रीब आकर पूछने लगा।
गीति दो क़दम पीछे हट गई। उसे अपने पति से इस वक़्त घिन आ रही थी। जिस आदमी के लिए उसने अपने आप को इतना सजाया था, वो उसे बचाने या अपना हक़ जताने की जगह, उसे दूसरे मर्दों के हवाले करना चाह रहा था।
ये एक पत्नी के लिए सबसे बड़ा, सबसे ज़लील करने वाला रिजेक्शन था। ‘तुम… तुम सच में बीमार हो गए हो, सोहम,’ गीति ने दबी हुई, रोने वाली आवाज़ में कहा।
उसकी आँखों में आँसू तैरने लगे थे। ‘तुम अपनी ही बीवी को ग़ैर मर्दों के बारे में सोचकर एक्साइट हो रहे हो? तुम्हें शर्म आनी चाहिए!’
सोहम का चेहरा थोड़ा सा स्टिफ़ हुआ, पर गीति रुकी नहीं। अपना पल्लू झटककर उसने वापस अपने कंधे पर डाला और वहाँ से तेज़ी से पलटकर अपने बेडरूम की तरफ़ भाग गई।
दरवाज़ा अंदर से ज़ोर से लॉक होने की आवाज़ आई। गीति ने मास्टर बेडरूम का दरवाज़ा अंदर से लॉक तो कर लिया था, पर उस कमरे की हर चीज़ उसे सोहम के उस गंदे, भयानक चेहरे की याद दिला रही थी।
घुटन इतनी बढ़ गई कि उसने अपना तकिया उठाया और चुपचाप गेस्ट रूम में चली गई। गेस्ट रूम में घुप अँधेरा था। गीति अकेली बेड पर लेटी थी, और उसके दिमाग़ में बार-बार धोखे और ठुकराव का वो मंज़र घूम रहा था।
जिस पति के लिए उसने आज अपने आदर्श तोड़े थे, उस नेवी ब्लू साड़ी में खुद को डिज़ायरेबल बनाया था, उसी पति ने उसे एक सस्ते खिलौने की तरह दूसरे मर्दों के आगे फेंकने की बात कर दी थी। पहले गुस्सा आया, फिर रोना।
पर जैसे-जैसे रात आगे बढ़ी, औरतों वाली वो फ़ितरती ज़िद उसके आँसुओं पर हावी होने लगी। ‘नहीं… मैं इतनी आसानी से हार नहीं मानूँगी,’ उसने अपने आप से कहा।
‘ये मेरा घर है। सोहम मेरा पति है। उसे कोई टेम्पररी साइकोलॉजिकल प्रॉब्लम हो सकती है, पर मैं उसके दिमाग़ से इस गंदे ‘ओपन रिलेशनशिप’ वाले कचरे को निकालकर रहूँगी। सोहम को वापस जीतना है… हर हाल में।’
तभी उसे गेस्ट रूम के बाहर से सोहम के क़दमों की आवाज़ आई। शायद वो किचन में पानी पीने जा रहा था। गीति की साँसें एक पल के लिए रुकीं, पर उसने दरवाज़ा नहीं खोला। उसने तय किया कि वो आज उसे इग्नोर करेगी।
अँधेरे में लेटी हुई गीति की आवाज़ें और ख़यालात अचानक उसके जिस्म की तरफ़ मुड़ गए। बिना सोचे-समझे, उसके हाथ अपने ही जिस्म पर घूमने लगे।
उसकी उँगलियाँ उसकी कॉलरबोन से होते हुए उसके पेट तक आईं। वो अपने ही नरम कर्व्स को छू रही थी, पर उसके दिमाग़ में सोहम की पुरानी छवियाँ थीं। वो दिन जब सोहम बिना उसकी मर्ज़ी के उसके पल्लू को खींच लिया करता था, जब सोहम की आँखों में उसके लिए सच्ची आग होती थी।
अपने ही जिस्म को छूते हुए, उन पुराने और पैशनेट पलों को याद करके गीति के पेट के निचले हिस्से में एक हल्की सी गर्मी दौड़ने लगी। पर आज, उस गर्मी में सिर्फ़ दर्द था।
उसने एक गहरी साँस ली और अपने हाथ हटा लिये। ‘कल से सब ठीक करना शुरू करूँगी,’ उसने खुद से एक झूठा वादा किया, और थकान के मारे सो गई।
अगली सुबह, गीति के दिमाग़ ने एक अलग ही खेल खेला। उसने रात को तय किया था कि वो सोहम को वापस जीतेगी, पर अवचेतन मन को किसी और ही चीज़ की भूख लग चुकी थी — ‘अटेंशन’।
वॉर्डरोब के सामने खड़े होकर, गीति ने अपनी रोज़ाना की लूज़ और आरामदायक कुर्तियों को छोड़ दिया। बिना ज़्यादा सोचे, उसके हाथों ने एक बेहद टाइट, बेबी-पिंक कलर की कुर्ती निकाली।
ये कुर्ती उसने ख़रीदी ज़रूर थी, पर पहनी कभी नहीं थी क्योंकि इसकी फ़िटिंग उसके ब्रेस्ट्स और हिप्स पर कुछ ज़्यादा ही क्लिंगी थी। पर आज, जब उसने आईने में उस टाइट कुर्ती को पहनकर खुद को देखा, तो उसके जिस्म का हर एक कर्व चीख़-चीख़कर नुमायाँ हो रहा था।
ब्रेकफ़ास्ट के वक़्त जब वो किचन में थी, सोहम डाइनिंग टेबल पर बैठा कॉफ़ी पी रहा था। गीति जान-बूझकर कॉफ़ी का मग लेकर उसके ठीक बगल से गुज़री।
रास्ता काफ़ी था, पर गीति ने अपने क़दमों को इस तरह एडजस्ट किया कि गुज़रते वक़्त उसका भरा हुआ हिप हल्के से सोहम के कंधे और बाज़ू से रगड़ खाता हुआ निकला। सोहम का हाथ एक सेकंड के लिए रुका, पर उसने गीति की आँखों में नहीं देखा।
गीति के अंदर फ़्रस्ट्रेशन की एक और लहर दौड़ गई। बैंक पहुँचने पर, उस पिंक टाइट कुर्ती का असर साफ़ दिखने लगा था।
गीति जब अपने केबिन से निकलकर फ़ाइल्स लेने HR सेक्शन की तरफ़ जा रही थी, तो उसका एक पुराना मेल कलीग, जो आम तौर पर बहुत तमीज़ से पेश आता था, वही फ़ाइल रैक के पास खड़ा था।
जैसे ही गीति रुकी, उसने नोटिस किया कि उस कलीग की नज़र उसकी आँखों पर नहीं थी। उसकी निगाहें उस टाइट कुर्ती के सीने पर बनने वाले खिंचाव और उसके हिप्स की फ़िटिंग पर बुरी तरह अटकी हुई थीं।
वो नज़र नॉर्मल नहीं थी — उसमें एक सस्ती, नंगी और ‘डर्टी’ हवस थी। वो उसके फ़िगर को ऐसे स्कैन कर रहा था जैसे उसके कपड़े उतार रहा हो।
गीति ने फ़ौरन उसकी निगाहों का रुख़ पहचान लिया। किसी और दिन वो इस बात पर गुस्सा करती, उसे डाँटती। पर आज? आज अचानक उसके चेहरे पर एक फ़्लश आ गया।
उसकी गर्दन शर्म से लाल हो गई। पर उस शर्म के ठीक नीचे, उसके जिस्म में एक ‘फ़ॉरबिडन थ्रिल’ — एक ऐसी गुदगुदी जो पाप और मज़े से भरी थी — दौड़ गई।
‘ये मुझे कितनी गंदी नज़र से देख रहा है… इसके दिमाग़ में ज़रूर मेरे जिस्म को लेकर डर्टी ख़याल चल रहे हैं,’ गीति ने सोचा, और ये सोचते ही उसकी थाइज़ के बीच एक अचानक सा गीलापन बनने लगा।
पर अगले ही सेकंड, उसकी पतिव्रता आत्मा ने चीख़ मारी। उसने जल्दी से फ़ाइल सीने से लगा ली और वहाँ से तेज़ी से पलट गई।
‘ये ग़लत है। बेहद ग़लत। मैं किसी और मर्द की इस सस्ती निगाह पर एक्साइट नहीं हो सकती। मैं जो कुछ भी कर रही हूँ, ये टाइट कपड़े, ये सब सिर्फ़ सोहम के लिए है। सिर्फ़ सोहम के लिए!’
वो अपने आप को कन्विंस करती हुई अपने केबिन में आकर बैठ गई, पर उसका दिल अभी भी ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।
रात का अँधेरा एक बार फिर उस शांत घर में उतर आया था। गीति अपने बेड पर लेटी थी। सोहम हमेशा की तरह दूसरी तरफ़ मुँह करके सो चुका था। पर गीति की आँखें छत को घूर रही थीं।
दिन भर उसने अपने दिमाग़ को बिज़ी रखने की कोशिश की, पर जैसे ही अँधेरा छाया, उसके दिमाग़ में बातों और मंज़र का एक ख़तरनाक कॉकटेल बनने लगा।
सुबह उस कलीग की वो हवस भरी ‘डर्टी’ नज़र, और पिछली शाम सोहम के कहे गए वो गंदे शब्द — ‘तुम्हें कैसा फ़ील हो रहा था… जब उनकी गंदी नज़रें तुम्हारे जिस्म पर पड़ रही थीं?’
गीति का दिमाग़ इन दोनों चीज़ों को आपस में जोड़ने लगा। उसकी साँसें बेड पर भारी होने लगीं। एक औरत होने के नाते, उसे अब पूरी तरह से ‘डिज़ायर्ड’ फ़ील करने की भूख लग चुकी थी, और सोहम उस भूख को किसी और मर्द के ज़रिये पूरा करने का बीज बो चुका था।
बिना किसी इरादे के, अँधेरे में उसके हाथ उसकी नाइटी के अंदर चले गए। उसकी उँगलियों ने उसके पेट को पार किया और सीधे उसकी कॉटन पैंटी के ऊपर आकर रुक गईं।
पैंटी के बाहर से ही उसे एहसास हो गया था कि वो सुबह की उस ‘डर्टी स्टेयर’ को याद करके अभी तक गीली थी। उसने हल्के-हल्के चूत को रब करना शुरू किया।
उसकी बंद आँखों के पीछे अब एक भयानक, ‘फ़ॉरबिडन’ फ़ैंटेसी रूप लेने लगी। वो इमेजिन करने लगी कि बैंक का वो कलीग उसके केबिन में अंदर आता है। वो उसकी इस टाइट पिंक कुर्ती को बेरहमी से फाड़ देता है।
वो गीति को दीवार पर धकेलकर उसके सीने को नोचने लगता है, उसे बताता है कि वो उसे कितनी गंदी निगाहों से देखता था। और सबसे टैबू ख़याल ये था कि गीति इमेजिन कर रही थी कि सोहम वहीं बैठा ये सब देख रहा है, और गीति को किसी और मर्द की हवस का शिकार होते देख एन्जॉय कर रहा है।
‘आह्ह… मम्म,’ गीति की साँस टूटने लगी। उसकी उँगलियों ने पैंटी को साइड किया और सीधे उसकी नंगी, थरथराती हुई चूत को मसलना शुरू कर दिया।
‘और देखो मुझे गंदी नज़र से… मैं औरत हूँ… चाहती हूँ मैं…’ वो अपने दिमाग़ में बेशर्म शब्दों को आज़ाद कर चुकी थी। प्लेज़र का लेवल बहुत तेज़ी से बढ़ रहा था।
उसकी चूत उस अनजान मर्द के ख़याल से आग की तरह तप रही थी। क्लाइमैक्स बस कुछ ही पल दूर था, उसका जिस्म ऐंठने लगा था…
पर अचानक! जैसे किसी ने ठंडे पानी की बाल्टी उसके नंगे जिस्म पर डाल दी हो। रियलिटी और संस्कारों ने उसे बीच में ही एक ज़ोरदार थप्पड़ मारा।
गीति की आँखें झटके से खुल गईं। उसकी साँसें बुरी तरह उखड़ी हुई थीं। उसने तुरंत अपना हाथ वहाँ से हटा लिया। उसका जिस्म अभी भी ऑर्गेज़्म के लिए तड़प रहा था, एक भयानक अधूरी आग उसके अंदर जल रही थी, पर उसने खुद को फ़िज़िकली रोक लिया।
‘नहीं! ये मैं क्या कर रही हूँ?’ गीति ने रुआँसी आवाज़ में, काँपते हुए विस्पर किया। ‘मैं एक पतिव्रता हूँ। मैं अपने पति के अलावा किसी और मर्द को अपने जिस्म पर सोचकर मास्टरबेट नहीं कर सकती। ये चीटिंग है… ये घटिया है!’
गीति ने तुरंत नाइटी ठीक की और करवट लेकर अपने घुटनों को सीने से लगा लिया। उसने खुद को पूरी तरह ‘कंट्रोल’ करने की नाकाम कोशिश की थी।
क्लाइमैक्स के ठीक पहले रुक जाने की वजह से उसके पेट के निचले हिस्से में एक चुभन भरा दर्द और भारीपन हो रहा था। कमरे की चुप्पी में वो अकेली, अधूरी और फ़्रस्ट्रेटेड लेटी थी।
उसने खुद को आज रोक तो लिया था, पर दिमाग़ में बोया गया वो बीज अब अंकुर बन चुका था। वो ‘बीइंग डिज़ायर्ड’ वाली फ़ीलिंग का नशा उसके ज़ेहन में उतर गया था।
वो नींद की आगोश में ढूँढती रही, पर वो टैबू ख़याल उसके सोते हुए दिमाग़ के एक कोने में मुस्कुराता रहा। पर कोई भी औरत इस अधूरेपन को लंबे वक़्त तक बर्दाश्त नहीं कर सकती।
अगले कुछ दिन इसी कशमकश में गुज़रे। गीति दिन में स्ट्रिक्ट बैंक मैनेजर बनने का दिखावा करती, पर उसकी हॉर्नीनेस का प्रेशर एक ऐसी सीटी बन चुका था जो बजने ही वाली थी।
आख़िर एक रात, जब सोहम उसे इग्नोर करके सो गया, गीति की फ़्रस्ट्रेशन अपने चरम पर पहुँच गई। उसकी जाँघों के बीच का खिंचाव इतना तीव्र था कि दिमाग़ की सारी दलीलें बेअसर हो गईं।
बिना कुछ सोचे, उसके हाथ अपने आप ब्लैंकेट के अंदर उसके फ़ोन की तरफ़ गए। स्क्रीन की रोशनी ने उसके चेहरे पर पड़ती थकान और हवस दोनों को नुमायाँ कर दिया। उसने फिर से ‘इनकॉग्निटो मोड’ खोला।
(yeh is kamuk kahani ka sabse gehra raaz tha)
सर्च बार में उसने काँपती उँगलियों से टाइप किया: ‘Wife shared by husband with colleagues – Desi hotwife story.’
एंटर दबाते ही उसकी धड़कनें गले तक आ गईं। उसने एक लंबी कहानी खोली। कहानी पढ़ना शुरू करते ही उसके दिमाग़ में शब्द विज़ुअल बनने लगे।
कहानी में एक औरत थी जिसे उसका पति अपने दोस्तों के आगे परोस देता था, और वो औरत शर्म के बावजूद उन पराये मर्दों के लुंड की आग में जलना एन्जॉय करने लगती थी।
गीति की साँसें अब तेज़ और उखड़ी हुई होने लगीं। उसने ब्लैंकेट को अपने चेहरे तक खींच लिया ताकि सोहम को उसकी साँसों की आवाज़ न सुनाई दे।
उसने अपने नाइटगाउन को धीरे से अपने घुटनों से ऊपर सरकाया, फिर थाइज़ तक, और आख़िर में अपनी कमर तक जमा कर लिया। उसकी गोरी, नंगी जाँघें अँधेरे में किसी संगमरमर की तरह लग रही थीं।
उसकी उँगलियों ने काँपते हुए उसकी पैंटी के इलास्टिक को छुआ और उसे नीचे खिसका दिया। जब उसकी नंगी उँगलियों ने उसके औरतपन को छुआ, तो वो आग से तप रहा था।
वो बेतहाशा गीली हो चुकी थी। उसकी चूत से निकलने वाला चिपचिपा रस इस बात का सबूत था कि ‘लॉयल्टी’ का पर्दा उठ चुका था।
उसने अपनी दो उँगलियों को अपनी गीली दरार पर रखा और आहिस्ता-आहिस्ता अपनी सूजी हुई क्लिट को मसलना शुरू किया। फ़ोन स्क्रीन की तरफ़ देखते हुए, उसने पढ़े हुए शब्दों को अपनी ज़िंदगी के साथ जोड़ना शुरू कर दिया।
अचानक उसके दिमाग़ में अपने बैंक के उन दो जूनियर कलीग्स का चेहरा फ़्लैश हुआ जो वॉटर कूलर के पास खड़े थे।
‘क्या माल लग रही हैं आज गीति मैम… ऐसी औरत बिस्तर में मिल जाए तो मर्द को और क्या चाहिए?’
गीति ने अपनी आँखें बंद कर लीं। उसकी फ़ैंटेसी ने एक नया रूप ले लिया। वो इमेजिन करने लगी कि वो अपने ऑफ़िस डेस्क पर लेटी है। उसका सारा पहनावा नंगा कर दिया गया है।
उसके दोनों जूनियर कलीग्स उसके ऊपर झुके हुए हैं। उनकी नंगी, हवस भरी निगाहें गीति के गोरे उभारों और खुली हुई टाँगों को घूर रही हैं। एक कलीग उसके होठों को बेरहमी से चूम रहा है, जबकि दूसरा उसकी गीली चूत को सहला रहा है।
और कमरे के कोने में… सोहम खड़ा है। सोहम उसे रोक नहीं रहा। सोहम मुस्कुराते हुए ये सब देख रहा है, उसे एक असल ‘हॉटवाइफ़’ बनने पर मजबूर कर रहा है।
‘ओह गॉड… आह्ह… मम्म,’ गीति के मुँह से एक बेकाबू सिसकी निकल गई। इस टैबू, स्कैंडलस और पाप से भरी फ़ैंटेसी ने उसके दिमाग़ के सारे फ़्यूज़ उड़ा दिये।
‘हाँ… और तेज़… मैं माल हूँ… यूज़ करो मुझे,’ वो अपने दिमाग़ में चीख़ रही थी। उसकी उँगलियों की रफ़्तार अपनी चूत के अंदर बेतहाशा बढ़ गई। अंदर-बाहर… अंदर-बाहर।
‘चपक-चपक’ की गीली आवाज़ ब्लैंकेट के अंदर गूँजने लगी। कुछ ही सेकंड्स में, गीति का पूरा जिस्म एक ख़तरनाक, झनझनाते हुए झटके के साथ क्लाइमैक्स पर पहुँच गया।
उसकी जाँघें बुरी तरह काँपने लगीं। उसने तकिये का कोना अपने दाँतों से दबोचा और अपनी सारी थकान, सारी भूख और हवस को उस बिस्तर पर निचोड़ दिया।
साँस नॉर्मल होने में कई मिनट लग गए। जिस्म को ठंडक तो मिल गई थी, पर जैसे ही दिमाग़ से हवस का धुआँ छँटा, रियलिटी ने उसे फिर एक ज़ोरदार झटका दिया।
गीति ने अपनी उँगलियों की तरफ़ देखा जो उसकी अपनी ही गंदगी से सनी हुई थीं। बगल में सोहम अभी भी सो रहा था। ‘शिट… शिट… ये मैंने क्या किया फिर से?’ गीति ने रोते हुए विस्पर किया।
एक गहरा, काला गिल्ट उसके सीने पर बैठ गया। वो जल्दी से वॉशरूम भागी। शावर ऑन किया और उस ठंडे पानी के नीचे घुटनों के बल बैठ गई।
वो पानी और साबुन से अपने जिस्म को ऐसे रगड़ रही थी जैसे रात के उस पाप, उस गंदी फ़ैंटेसी को अपनी स्किन से छीलकर निकाल देना चाहती हो।
‘मैं एक गंदी औरत बनती जा रही हूँ। ये सब ग़लत है। मुझे ऐसी फ़ैंटेसीज़ में मज़ा आना ग़लत है,’ वो रोते हुए खुद को समझा रही थी।
अगली सुबह जब उसने आईने में खुद को देखा, तो उसने डिसाइड किया कि वो उस टैबू दुनिया को दोबारा मुड़कर नहीं देखेगी।
दिन की रोशनी में गीति एक स्ट्रिक्ट, प्रोफ़ेशनल और ‘पतिव्रता’ औरत का मुखौटा पहन लेती। वो बैंक में अपनी नज़रें नीची रखती, अपने पल्लू को स्ट्रिक्ट तरीक़े से पिन-अप करती और पुरुष कलीग्स से सीधे मुँह बात करने से भी बचती।
पर ये दिखावा धीरे-धीरे खोखला होता जा रहा था। क्योंकि जैसे ही रात का अँधेरा छाता, और सोहम उसकी तरफ़ पीठ करता, गीति की हवस उसकी अच्छाई पर भारी पड़ने लगती।
जो चीज़ पछतावे के साथ शुरू हुई थी, वो अब एक आदत बन चुकी थी। धीरे-धीरे, बिना किसी को पता चले, गीति का ये ‘सीक्रेट साइकल’ सेट हो गया।
हफ़्ते में कम से कम 2 या 3 बार, जब भी सोहम की ठंडी बेरुखी उसे रुलाती, वो अपने फ़ोन में डूब जाती। अब उसकी सर्च हिस्ट्री में नए-नए शब्द जुड़ चुके थे — ‘Cuckold husband’, ‘Wife sharing’, ‘Desi Bhabhi passed to strangers’।
उसका दिमाग़ अब इस नशे का आदी हो चुका था। जिस ‘हॉटवाइफ़’ शब्द से वो पहले नफ़रत करती थी, अब वही शब्द उसके जिस्म में बिजली दौड़ा देता था।
मास्टरबेट करते वक़्त वो अक्सर अपने आप को पराये मर्दों के सस्ते, हवस भरे शब्दों में इमेजिन करती। ये डबल-लाइफ़ उसके दिमाग़ के दो हिस्से कर चुकी थी — दिन में Dr. Jekyll (संस्कारी गीति) और रात में Mr. Hyde (हवसी गीति)।
पर कोई भी नशा सिर्फ़ रात के अँधेरे तक सीमित नहीं रहता। धीरे-धीरे उस आदत ने दिन के उजाले में भी अपना असर दिखाना शुरू कर दिया।
क़रीब तीन हफ़्ते इस रूटीन के बाद, छोटे-छोटे बदलाव शुरू हुए। एक दिन गीति जब बैंक जाने के लिए आईने के सामने खड़ी थी, उसने अपना ब्लाउज़ पहना।
आम तौर पर उसके ब्लाउज़ के गले बहुत डिसेंट और शैलो होते थे। पर आज, बिना पूरी तरह सोचे, उसने सेफ़्टी पिन को निकालकर ब्लाउज़ का डीप-V नेक थोड़ा और खोल दिया, जिससे उसकी मिल्की व्हाइट क्लीवेज की एक हल्की सी दरार साफ़ नज़र आने लगी।
गीति अब अपने पल्लू को बार-बार कसकर कंधे पर नहीं डालती थी; बल्कि उसे थोड़ा ढीला छोड़ देती, ताकि उसके कर्व्स और बेटर डिफ़ाइन हो सकें।
ये सब वो जान-बूझकर नहीं कर रही थी, बल्कि ये उसकी उस बढ़ती हुई आदत और हवस का सबकॉन्शियस नतीजा था। एक इज़्ज़तदार पत्नी धीरे-धीरे उस रास्ते पर अपने क़दम बढ़ा रही थी, जिस रास्ते का दरवाज़ा उसके अपने पति ने ही खोला था।
(yeh hindi sex kahani ka second part tha — agla part jald aa raha hai!)